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अधिकांश स्कूलों में सामग्री पहुंची नहीं, फिर भी CAC से मांगा जा रहा उपलब्धता प्रमाणपत्र;संस्था प्रमुखों से सीधा जानकारी क्यो नहीं ले रहा विभाग,4.51 करोड़ के गबन के आरोपों के बीच वायरल चैट से उठे सवाल





डेस्क खबर बलरामपुर ../जिले के शिक्षा विभाग में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब स्कूलों में सामग्री की उपलब्धता के प्रमाणपत्र को लेकर नया मामला सामने आया है। आरोप है कि जिले के अधिकांश स्कूलों में संबंधित सामग्री पहुंची ही नहीं, इसके बावजूद CAC (संकुल अकादमिक समन्वयक) के माध्यम से उपलब्धता प्रमाणपत्र तैयार कराने का दबाव बनाया जा रहा है। विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप की कथित चैट सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं।


मामले को इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि जिला शिक्षा अधिकारी पर पहले से ही करीब 4 करोड़ 51 लाख रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी/गबन के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों और वायरल चैट की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी बाकी है।
स्कूलों में सामग्री नहीं, फिर प्रमाणपत्र किस आधार पर?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि किसी स्कूल में सामग्री उपलब्ध ही नहीं है, तो उसकी उपलब्धता का प्रमाणपत्र किस आधार पर जारी किया जा रहा है? आरोप है कि कुछ स्कूलों के संस्था प्रमुखों के बजाय CAC के माध्यम से प्रमाणपत्र तैयार कराने की कवायद की जा रही है।कहीं ऐसा तो नहीं की डीईओ मनीराम यादव पर चल रहे जांच को एक अलग दिशा देने की कोशिश है।



शिक्षा विभाग से जुड़े लोगों का कहना है कि किसी संस्था में सामग्री की वास्तविक उपलब्धता का प्रमाणित रिकॉर्ड संस्था स्तर पर होना चाहिए। ऐसे में यदि स्कूल के प्रधान पाठक,प्राचार्य अथवा संस्था प्रमुख ने सामग्री प्राप्त होने की पुष्टि नहीं की है, तो किसी अन्य स्तर से उपलब्धता प्रमाणपत्र तैयार कराने की कोशिश जांच की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर सकती है।


जांच के बीच नया विवाद, दबाव बनाने का आरोप
वायरल हो रही कथित विभागीय चैट को लेकर आरोप लगाया जा रहा है कि CAC पर प्रमाणपत्र उपलब्ध कराने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। आरोप लगाने वालों का दावा है कि यह पूरी कवायद उस समय सामने आई है, जब शिक्षा विभाग में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर जांच चल रही है।
यही वजह है कि मामले को केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया न मानकर जांच की दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है। आरोप है कि यदि उन संस्थाओं के नाम से उपलब्धता प्रमाणपत्र तैयार कर दिए जाते हैं, जहां वास्तव में सामग्री पहुंची ही नहीं, तो बाद में रिकॉर्ड के आधार पर सामग्री वितरण को सही साबित करने की कोशिश की जा सकती है।
हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि वायरल चैट के आधार पर किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका को दोषी साबित नहीं माना जा सकता। इसकी पुष्टि संबंधित दस्तावेजों, स्टॉक रजिस्टर, वितरण रिकॉर्ड और मौके पर भौतिक सत्यापन से ही संभव होगी।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप का चैट
इस पूरे मामले में विभागीय व्हाट्सएप ग्रुप की कथित बातचीत सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विवाद और बढ़ गया है। वायरल चैट में प्रमाणपत्र को लेकर दिए गए निर्देशों और संबंधित अधिकारियों/कर्मचारियों के बीच हुई बातचीत का दावा किया जा रहा है।
यदि चैट वास्तविक है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। वहीं यदि चैट में किसी प्रकार की एडिटिंग या छेड़छाड़ हुई है, तो इसकी भी तकनीकी जांच जरूरी होगी। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच के लिए चैट की सत्यता के साथ-साथ उसके स्रोत और संदर्भ की जांच भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
₹4.51 करोड़ की कथित गड़बड़ी के आरोपों से जुड़ रहा मामला
जिला शिक्षा अधिकारी पर 4 करोड़ 51 लाख रुपये की कथित वित्तीय अनियमितता/गबन के आरोप पहले से लगाए जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में अब सामग्री की उपलब्धता और प्रमाणपत्र तैयार कराने को लेकर सामने आया विवाद विभाग के लिए नई मुश्किल खड़ी कर सकता है।
आरोपों की वास्तविकता सामने लाने के लिए जांच एजेंसी को यह देखना होगा कि संबंधित सामग्री की खरीद कब हुई, किस मद से भुगतान किया गया, सामग्री किन स्कूलों के लिए भेजी गई, परिवहन और वितरण का रिकॉर्ड क्या है तथा संबंधित संस्थाओं के स्टॉक रजिस्टर में इसकी एंट्री हुई या नहीं।
भौतिक सत्यापन से खुल सकता है पूरा मामला
पूरे मामले की सच्चाई जानने का सबसे प्रभावी तरीका संबंधित स्कूलों में भौतिक सत्यापन माना जा रहा है। यदि रिकॉर्ड में सामग्री की आपूर्ति दर्शाई गई है, तो मौके पर उसकी उपलब्धता, स्टॉक रजिस्टर और प्राप्ति प्रमाणपत्र का मिलान किया जा सकता है।
यदि दस्तावेजों में सामग्री पहुंचना दर्ज है लेकिन स्कूलों में वह उपलब्ध नहीं मिलती, तो मामला गंभीर वित्तीय अनियमितता की ओर इशारा कर सकता है। वहीं यदि सामग्री वास्तव में उपलब्ध पाई जाती है, तो वायरल चैट और लगाए जा रहे आरोपों की भी उसी आधार पर जांच होनी चाहिए।
अब सवाल—किसके निर्देश पर बन रहे प्रमाणपत्र?
पूरे विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सामग्री की वास्तविक उपलब्धता स्कूल स्तर पर जांची जानी है, तो CAC के माध्यम से प्रमाणपत्र बनवाने की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या यह केवल विभागीय प्रक्रिया का हिस्सा है या इसके पीछे कोई अन्य वजह है?
फिलहाल आरोप, वायरल चैट और उपलब्धता प्रमाणपत्र को लेकर कई सवाल सामने हैं। इनका जवाब निष्पक्ष जांच और दस्तावेजों की जांच के बाद ही सामने आएगा। अब निगाहें इस बात पर हैं कि शिक्षा विभाग और संबंधित जांच अधिकारी इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं और ₹4.51 करोड़ की कथित वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों के साथ सामने आए इस नए विवाद पर जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष क्या है!

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