डेस्क खबरबिलासपुर

PM आवास में बड़ा खेल! भदौरा पंचायत में एक ही परिवार को कई आवास, जांच में खुलासा फिर भी जिम्मेदारों पर मेहरबानी? सरपंच और सचिव मिल कर गरीबों के आवास के नाम पर खेल रहे है खेल




डेस्क खबर | बिलासपुर/मरवाही।. गरीबों के सिर पर पक्की छत देने के लिए बनाई गई प्रधानमंत्री आवास योजना… लेकिन मरवाही की भदौरा ग्राम पंचायत में इसी योजना पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि एक ही परिवार के कई सदस्यों के नाम पर अलग-अलग PM आवास स्वीकृत कर सरकारी राशि जारी कर दी गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मामला सिर्फ शिकायत तक सीमित नहीं है। शिकायत के बाद जांच हुई, जांच में नियम विरुद्ध लाभ दिए जाने की बात सामने आई और जांच टीम ने राशि वसूली के साथ कार्रवाई की अनुशंसा भी कर दी। बावजूद इसके जिम्मेदारों पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं होना कई सवालों को जन्म दे रहा है।
एक परिवार… कई आवास… सरकारी राशि भी जारी!
शिकायतकर्ता अमर सिंह राठौर की शिकायत पर हुई जांच में पंचायत स्तर पर हितग्राही चयन और आवास स्वीकृति की प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं।


जांच रिपोर्ट के मुताबिक गुलाब सिंह और उनके पिता लोहान सिंह—दोनों के नाम से आवास स्वीकृत किए गए और दोनों को करीब 40-40 हजार रुपये की पहली किस्त मिलने का उल्लेख है।
इसी तरह शिवनाथ सिंह और उनके बेटे हिमत सिंह के नाम से भी अलग-अलग आवास स्वीकृत होने और राशि मिलने की बात जांच में दर्ज है।
यानी सवाल सीधा है—जिस योजना में एक पात्र परिवार को आवास मिलना चाहिए, वहां एक ही परिवार के कई सदस्यों को लाभ कैसे पहुंचा?


पति-पत्नी के नाम भी अलग-अलग आवास!
मामला यहीं खत्म नहीं होता।
जांच में पति-पत्नी दोनों के नाम अलग-अलग आवास स्वीकृत होने की बात भी सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार पत्नी को दो किस्तें मिल चुकी हैं, जबकि पति को करीब 40 हजार रुपये की पहली किस्त प्राप्त हुई।
अगर जांच रिपोर्ट में दर्ज तथ्य सही हैं, तो सवाल केवल राशि का नहीं बल्कि उस पूरी प्रक्रिया का है जिसके जरिए ये आवास स्वीकृत हुए।
गोंदवती का आवास भी सवालों के घेरे में
जांच में गोंदवती के आवास को निरस्त करने की अनुशंसा भी की गई है। रिपोर्ट में बताया गया कि उसकी पात्रता ससुराल वाले गांव में बनती है, इसके बावजूद भदौरा पंचायत में आवास स्वीकृत कर दिया गया।
अब सवाल यह है कि हितग्राही की पात्रता जांचने की जिम्मेदारी किसकी थी?
जांच हो गई… गड़बड़ी सामने आ गई… फिर कार्रवाई क्यों नहीं?
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और सबसे गंभीर सवाल यही है।
जब शिकायत हुई तो जांच हुई।
जब जांच हुई तो अनियमितताएं सामने आईं।
जब अनियमितताएं सामने आईं तो राशि वसूली और कार्रवाई की अनुशंसा भी हुई।
फिर कार्रवाई किसके आदेश का इंतजार कर रही है?
क्या जांच रिपोर्ट सिर्फ सरकारी फाइलों में बंद रखने के लिए बनाई गई थी?
अगर पंचायत के स्तर पर नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदारी तय कौन करेगा? और अगर किसी की भूमिका नहीं है, तो फिर जांच में नियम विरुद्ध स्वीकृतियों का जिम्मेदार कौन है?
गरीबों की योजना में खेल हुआ तो असली हकदार कहां जाएं?
प्रधानमंत्री आवास योजना किसी रसूखदार या प्रभावशाली व्यक्ति को फायदा पहुंचाने की योजना नहीं, बल्कि गरीब और जरूरतमंद परिवारों के लिए सरकार की सबसे महत्वपूर्ण आवासीय योजनाओं में से एक है।
ऐसे में अगर एक ही परिवार के कई सदस्यों को नियमों के विपरीत लाभ मिला है, तो यह केवल सरकारी राशि का मामला नहीं है। यह उन गरीब परिवारों के हक का सवाल है जो आज भी पक्के मकान के इंतजार में हैं।
अब प्रशासन को तय करना होगा कि जांच रिपोर्ट सिर्फ कागज का टुकड़ा है या कार्रवाई का आधार।
भदौरा पंचायत के इस मामले में अब निगाहें प्रशासन पर हैं। क्या जिम्मेदारों से सरकारी राशि की वसूली के साथ-साथ उनकी जवाबदेही भी तय होगी? क्या नियमों को ताक पर रखकर आवास स्वीकृत करने वालों पर कार्रवाई होगी? या फिर जांच रिपोर्ट भी दूसरी शिकायतों की तरह सरकारी फाइलों में धूल फांकती रहेगी?
क्योंकि सवाल सिर्फ कुछ आवासों का नहीं है… सवाल सरकार की उस योजना की विश्वसनीयता का है, जिसका मकसद गरीब के सिर पर छत देना है—न कि अपात्रों की झोली भरना।

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