निगम की दुकानों में डकैती का धंधा: कमिश्नर साहब, चुप्पी की साजिश या लूट की हिस्सेदारी ?


स्थानीय पब्लिक की कलम से
रायगढ़ :- शहर के नगर निगम की दुकानों में किराए का घोटाला अब हर गली-मोहल्ले की जुबान पर चढ़ चुका है, लेकिन निगम कमिश्नर साहब की संदिग्ध खामोशी इस काले कारनामे को और गहरा रंग दे रही है! सूत्रों ने विस्फोटक खुलासा किया है कि निगम की दुकानें, जो सस्ते किराए पर दी गई थीं, अब कुछ बेशर्म दुकानदारों और सियासी गुंडों के लिए सोने की खान बन चुकी हैं। ये लोग निगम को मामूली किराया देकर दुकानें हथियाते हैं और फिर उन्हें बाजार में मोटा किराया वसूलकर खुलेआम डकैती मचा रहे हैं। और कमिश्नर साहब? वो तो आंखों पर काली पट्टी, कानों में मोम और जुबान पर ताला डाले इस लूट को चुपचाप देख रहे हैं! शहरवासी चीख-चीखकर पूछ रहे हैं—कमिश्नर साहब, क्या आप इस घोटाले के सरगना हैं, या सिर्फ चुप रहकर चोरों का साथ दे रहे हैं?
*लूट का नंगा नाच, कमिश्नर की चुप्पी*
सूत्रों के हवाले से पता चला है कि निगम की सैकड़ों दुकानें इस घोटाले की भट्टी में झोंक दी गई हैं। कुछ दुकानदार इतने शातिर हैं कि दुकान का शटर तक नहीं खोलते। उनका धंधा साफ है—निगम से सस्ते में दुकान लो, उसे बाजार में भारी किराए पर चढ़ाकर मुनाफा बटोरो। इस काले कारोबार में कुछ नेताओं की भी पूरी मौज है, जो अपने रसूख और कमिश्नर साहब की कथित मेहरबानी के दम पर निगम को दिन-रात लूट रहे हैं। कमिश्नर साहब, इतना बड़ा घोटाला आपकी नाक के नीचे चल रहा है, और आपकी आंखें बंद हैं? या फिर ये बंद आंखें किसी गहरी साजिश का हिस्सा हैं? जनता पूछ रही है—क्या आपकी चुप्पी इस लूट में हिस्सेदारी का सबूत है?
*जनता का गुस्सा, कमिश्नर पर सवाल*
शहरवासी इस घोटाले से आगबबूला हैं। उनका कहना है कि निगम को हो रहा नुकसान आखिरकार जनता की जेब से ही वसूला जाएगा। टैक्स का बोझ बढ़ेगा, सड़कें-नालियां और खराब होंगी, और इस लूट का दंश आम आदमी को झेलना पड़ेगा। लोग खुलकर चिल्ला रहे हैं—कमिश्नर साहब, क्या आपकी कुर्सी सिर्फ ऐशो-आराम और रिश्वत की फाइलें सरकाने के लिए है? अगर आपको इस घोटाले की खबर नहीं, तो आप इस कुर्स।
र्सी के लायक ही नहीं! और अगर खबर है, तो ये चुप्पी किसके इशारे पर? क्या आपकी खामोशी इस लूट के मुनाफे में आपका हिस्सा छिपा रही है? सूत्र साफ कह रहे हैं—कमिश्नर साहब, अब तो सच बोलिए, वरना जनता आपको इस डकैती का मास्टरमाइंड मानने को मजबूर हो जाएगी!
*घोटाले का काला चिट्ठा*
– *खेल का तरीका*: निगम से सस्ते किराए पर दुकान हथियाओ, बाजार में मोटा किराया वसूलो।
– *लुटेरे*: कुछ बेशर्म दुकानदार और उनके सियासी आका।
– *नुकसान*: निगम की आय ठप, जनता पर टैक्स की मार।
– *कमिश्नर की भूमिका*: चुप्पी, जो अब साजिश की तरह बदबू मार रही है।
*जनता की हुंकार, कमिश्नर पर निशाना*
शहर के व्यापारी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ता और आम नागरिक इस घोटाले पर तुरंत कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि कमिश्नर साहब फौरन जांच शुरू करें, दोषी दुकानदारों की दुकानें छीनें, और इस लूट में शामिल नेताओं को बेनकाब करें। लेकिन सबसे बड़ा सवाल कमिश्नर साहब की भूमिका पर है। जनता चीख रही है—कमिश्नर साहब, क्या आपकी चुप्पी इसलिए है कि इस लूट का मुनाफा आपकी जेब तक पहुंच रहा है? इतना बड़ा घोटाला बिना ऊपरी संरक्षण के कैसे चल सकता है? लोग अब कमिश्नर की जांच की मांग कर रहे हैं, क्योंकि इस चुप्पी की गंध अब साजिश से ज्यादा गद्दारी की तरह लग रही है।
*कमिश्नर साहब, जवाब दो, वरना कुर्सी छोड़ो!*
हमारी टीम ने कमिश्नर साहब से इस घोटाले पर जवाब लेने की बार-बार कोशिश की, मगर हर बार उनकी ओर से सन्नाटा ही मिला। शहरवासी पूछ रहे हैं—कमिश्नर साहब, ये खामोशी किसे बचा रही है? क्या आपकी चुप्पी इस लूट के मास्टरमाइंड्स को बचाने की साजिश है? या फिर आपकी कुर्सी इतनी कमजोर है कि आप इन लुटेरों के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोल सकते? जनता का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है, और ये चुप्पी उस आग को और भड़का रही है। कमिश्नर साहब, अगर आप अब भी नहीं बोले, तो जनता आपको इस घोटाले का सबसे बड़ा गुनहगार करार देगी।
*आखिरी चेतावनी*
अगर कमिश्नर साहब अब भी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे और इस घोटाले की गहरी जांच कर दोषियों को सलाखों के पीछे नहीं पहुंचाया, तो शहर की जनता सड़कों पर उतरने को तैयार है। ये घोटाला सिर्फ निगम की दुकानों की लूट नहीं, बल्कि जनता के भरोसे, शहर की ईमानदारी और कमिश्नर की जवाबदेही पर डाका है। कमिश्नर साहब, ये आखिरी मौका है—या तो इस लूट को रोकिए, दोषियों को सजा दिलाइए, और अपनी चुप्पी तोड़िए, वरना जनता का गुस्सा और आपकी खामोशी मिलकर आपकी कुर्सी ही उखाड़ फेंकेंगे।
*कमिश्नर साहब की चुप्पी अब शहर का सबसे बड़ा कांड बन चुकी है। क्या ये खामोशी महज डर है, या इसके पीछे कोई बड़ा खेल चल रहा है?