छत्तीसगढ़डेस्क खबर

प्रदेश में आदिवासी बच्चों के हिस्से में घटिया कंबल, जिम्मेदारों पर कौन डालेगा निगरानी? 3000 से अधिक छात्रावासों में सप्लाई कंबलों की गुणवत्ता पर सवाल, खुजली की शिकायतें; सिर से पैर तक ढकना भी मुश्किल!


डेस्क खबर छत्तीसगढ़../ जिन आदिवासी बच्चों के भविष्य संवारने की जिम्मेदारी सरकार ने उठाई है, क्या उनकी तकलीफों की किसी को परवाह भी है? छात्रावासों में सप्लाई किए गए कंबलों को लेकर सामने आ रही शिकायतें व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। आरोप है कि कंबल इतने छोटे हैं कि सिर से पैर तक शरीर ढकना मुश्किल है, वहीं इस्तेमाल करने पर खुजली की शिकायतें भी सामने आ रही हैं।
सवाल है—बच्चों के लिए खरीदे गए कंबल अगर बच्चों के ही काम नहीं आ रहे, तो सरकारी खजाने से खर्च हुई रकम का फायदा किसे मिला?
राज्य स्तर से वर्षों से हो रही सप्लाई के बावजूद गुणवत्ता पर सवाल उठना निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की मांग करता है।

आयुक्त डी. राहुल वेंकट के विभाग में अब जरूरत कागजी खानापूर्ति की नहीं, बल्कि खरीद से लेकर सप्लाई तक निष्पक्ष जांच की है।आखिर आदिवासी बच्चों की मजबूरी कब तक व्यवस्था की लापरवाही का बोझ ढोती रहेगी? गरीब बच्चों को राहत देने के नाम पर ऐसी सामग्री मिलना, यदि जांच में सही पाया जाता है, तो जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। बच्चों की पीड़ा कोई मामूली शिकायत नहीं—यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जो उनके बेहतर भविष्य का दावा करती है।आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के छात्रावासों में सप्लाई किए गए कंबलों की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों ने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर ध्यान खींचा है। अब आयुक्त डी. राहुल वेंकट के सामने चुनौती है कि शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराएं और यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित करें।
सवाल किसी अधिकारी पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि आदिवासी बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं की जवाबदेही तय करने का है। आखिर सप्लाई के मानकों की जांच हुई या नहीं? इन सवालों का जवाब जांच और दस्तावेजों से सामने आना चाहिए।

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