डेस्क खबरबिलासपुर

एक घंटे का इंतजार… और थम गई 7 साल की मासूम की सांसें! सर्पदंश के बाद कोटा CHC से सिम्स रेफर, एंबुलेंस व्यवस्था पर गंभीर सवाल; अब जवाबदेही तय होगी या मामला फाइलों में दब जाएगा?



डेस्क खबर बिलासपुर../ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर अक्सर आंकड़ों में नहीं, बल्कि अस्पताल के बाहर जिंदगी और मौत से जूझते मरीजों के इंतजार में दिखाई देती है। कोटा क्षेत्र के ग्राम बिल्लीबंद धनुवारपारा की सात वर्षीय रायना बंजारे की मौत ने इसी व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। परिजनों के मुताबिक बुधवार तड़के करीब 4 बजे रायना की तबीयत अचानक बिगड़ी। पेट दर्द, उल्टी और सांस लेने में तकलीफ के बाद सर्पदंश की आशंका में परिवार उसे ऑटो से कोटा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र लेकर पहुंचा। प्राथमिक उपचार के बाद डॉक्टरों ने गंभीर हालत देखते हुए सिम्स बिलासपुर रेफर कर दिया।
यहीं से शुरू हुआ वह इंतजार, जिसने व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया। परिजनों का आरोप है कि सिम्स ले जाने के लिए एंबुलेंस मिलने में करीब एक घंटे की देरी हुई। उनका दावा है कि अस्पताल परिसर के बाहर एंबुलेंस नजर आने के बावजूद रतनपुर से एंबुलेंस बुलाने की बात कही गई।


आखिरकार बच्ची को सिम्स पहुंचाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। यदि समय पर मासूम को सिम्स रेफर करने के लिए एंबुलेंस मिल जाती तो शायद उसकी जान बच जाती ।
अब सवाल सिर्फ रायना की मौत का नहीं, बल्कि आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारी का है। गंभीर मरीज के लिए एंबुलेंस कितनी जल्दी उपलब्ध होनी चाहिए? देरी हुई तो जिम्मेदार कौन है—स्थानीय स्वास्थ्य प्रबंधन, एंबुलेंस व्यवस्था या संबंधित अधिकारी?
मौत का चिकित्सकीय कारण और देरी का उपचार तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा लेकिन रायना की मौत ने व्यवस्था से एक सीधा सवाल जरूर पूछ दिया है—आपात स्थिति में अगर एंबुलेंस भी इंतजार कराए, तो ग्रामीण मरीज आखिर भरोसा किस पर करे?

error: Content is protected !!