
डेस्क खबर बिलासपुर./ केंद्र सरकार और राज्य सरकार की योजना में गरीबों के हक का चावल… और बदले में नगद पैसा! बिलासपुर में सरकारी राशन व्यवस्था को लेकर सामने आया एक वीडियो सिस्टम की निगरानी पर ही सवाल खड़े कर रहा है। वीडियो में एक राशन दुकानदार कथित तौर पर हितग्राही को चावल देने के बजाय उसके बदले नगद रकम देता नजर आ रहा है। ताजा मामला और वीडियो वॉर्ड क्रमांक 56 विजय नगर चांटीडीह दुकान आईडी 1146 से संचालित मा बुढ़ीमाइ बहुउद्देशीय सहकारी समिति का बताया जा रहा है जहां सूत्र ने नाम और पहचान उजागर नहीं करने की शर्त में यह वीडियो बनाया। सूत्र का दावा है कि दुकान में फिंगर प्रिंट लेकर सरकारी चावल के बदले नगद पैसा दिया जा रहा है

आरोप है कि यह कोई अकेला मामला नहीं, बल्कि शहरी से लेकर ग्रामीण इलाकों तक सरकारी चावल की खरीद-फरोख्त का कथित नेटवर्क सक्रिय है। हितग्राहियों से चावल लेकर उसे आगे बड़े कारोबारियों तक पहुंचाने और फिर राइस मिलों में खपाने की आशंका जताई जा रही है। और यह चावल कालाबाजारी दुकान से लेकर मिल तक अपना एक अलग ही सिंडिकेट बना के रखे हुए है और जमकर सरकारी चावल की अफरातफरी ,कालाबाजारी और मुनाफाखोरी कर रहे है।
दुकान से मिल तक कथित सिंडिकेट?
सबसे गंभीर आरोप सरकारी चावल के परिवहन और भंडारण को लेकर हैं। आरोप है कि कुछ वाहनों की जीपीएस निगरानी को गुमराह कर निर्धारित राशन दुकान के बजाय दूसरे स्थानों पर एक साथ सरकारी माल खाली कराया जाता है। इसके बाद सरकारी बोरियों से चावल निकालकर दूसरी बोरियों में भरने और उसे बाजार में खपाने का कथित खेल चलता है। बताया जाता है कि इस रसूखदार व्यापारी को राजनैतिक और विभागीय संरक्षण भी मिला हुआ है इतना ही विभागीय सूत्रों की माने तो भौतिक सत्यापन के नाम पर मंगला चौक में एक बिल्डर के दफ्तर मे महीने की एक रकम भी हर महीने के नाम पर तथाकथित लोग विभाग के नाम पर वसूल कर रहे है,और सच उजागर करने वालो के खिलाफ एक सिंडकेट बना कर झूठे मामलों में फंसाने का चक्रव्यूह रच कर इस गोरख और गैरकानूनी काम को खुलेआम अंजाम देने का काम बेखौफ कर रहे है।
अगर ये आरोप सही हैं तो यह महज राशन दुकान की अनियमितता नहीं, बल्कि राशन दुकान से लेकर परिवहनकर्ता, गोदाम और राइस मिल तक फैली पूरी सप्लाई चेन की जांच का मामला है।
वीडियो और शिकायत के बाद भी ‘नोटिस का खेल खेला जा रहा है जिसके चलते खाद्य विभाग की कार्रवाई शक के घेरे में है । शिकायतें पहुंच रही हैं, वीडियो सामने आ रहे हैं, लेकिन आरोप है कि कार्रवाई नोटिस जारी करने और कागजी प्रक्रिया तक सीमित रह जाती है।
गरीब के हिस्से का चावल बाजार में बिक रहा है या नहीं, इसकी जांच कौन करेगा?
अब जरूरत है कि विभाग केवल राशन दुकानों तक सीमित न रहे, बल्कि स्टॉक रजिस्टर, ई-पॉस रिकॉर्ड, परिवहन वाहनों का जीपीएस डेटा, गोदामों और संबंधित राइस मिलों के स्टॉक का मिलान कर पूरे मामले की जांच करे।क्योंकि सवाल सिर्फ चावल का नहीं है—सवाल उस गरीब के हक का है, जिसके नाम पर सरकारी अनाज आता है और कथित तौर पर बाजार में मुनाफे का माल बन जाता है।
बड़ा सवाल
कौन रोक रहा है सरकारी चावल की कथित कालाबाजारी?
किसके संरक्षण में चल रहा है यह खेल?
नोटिस से आगे कब बढ़ेगा विभाग?
और गरीब के हक के चावल पर हाथ डालने वालों पर कब होगी ठोस कार्रवाई? तमाम ऐसे सवाल है जिसका जवाब जिम्मेदार विभाग के अफसरो पर है लेकिन वे कैमरे में कुछ भी बोलने से बचते है।
