डेस्क खबर

कबाड़ियों पर पुलिस की कार्रवाई से हड़कंप, लेकिन बड़े खिलाड़ियों पर कब पड़ेगा हाथ?
ग्रामीण इलाकों में कार्रवाई से मचा हड़कंप, शहर के रसूखदार कबाड़ कारोबारियों पर अब तक खामोशी!



डेस्क खबर बिलासपुर./ बिलासपुर जिले में कबाड़ कारोबार की आड़ में चोरी के माल की खरीद-फरोख्त के आरोपों को लेकर पुलिस की कार्रवाई ने छोटे-बड़े कबाड़ कारोबारियों में खलबली जरूर मचा दी है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ कबाड़ दुकानों पर कार्रवाई के बाद संचालकों में डर का माहौल बताया जा रहा है। लेकिन इसी बीच बड़ा सवाल यह है कि शहर के उन बड़े कबाड़ कारोबारियों पर पुलिस की नजर कब पड़ेगी, जिनके कारोबार पर वर्षों से सवाल उठते रहे हैं?


शहर के कई घनी आबादी वाले इलाकों में कबाड़ की दुकानें और गोदाम संचालित होने की बात सामने आती रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन दुकानों में दिनभर लोहे को काटने-पीटने की तेज आवाज से आसपास रहने वाले लोग परेशान होते हैं। इसके अलावा चोरी के सामान की खपत में छोटे कबाड़ियों से लेकर बड़े कबाड़ कारोबारियों तक की कथित भूमिका की भी चर्चा होती रही है।


खपरगंज का मामला भी सवालों के घेरे में है। घटना के बाद इलाके की दो बड़ी कबाड़ दुकानें कुछ समय के लिए बंद रही थीं, लेकिन अब इनके दोबारा आबाद होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि पुलिस को कबाड़ कारोबार में गड़बड़ी की आशंका है तो शहर की बड़ी दुकानों और गोदामों की भी व्यापक जांच क्यों नहीं की जा रही?


कबाड़ के कारोबार में मुनाफे का गणित भी अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। बाजार में जिस लोहे के पाइप की कीमत करीब 80 रुपये किलो तक बताई जाती है, वही चोरी का माल होने की स्थिति में कबाड़ में 15 से 20 रुपये किलो के आसपास खरीदे जाने की चर्चा है। यही वजह है कि आरोप लगते हैं कि कुछ कबाड़ दुकानें वैध कारोबार से ज्यादा चोरी के माल की खपत का जरिया बन गई हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।चर्चा तो यहां तक है कि कुछ कबाड़ ठिकानों पर असामाजिक तत्वों के जमावड़े से लेकर हथियार रखे जाने तक की बातें सामने आती रहती हैं। यदि ऐसा है तो यह केवल कबाड़ कारोबार का मामला नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय हो सकता है।


फिलहाल पुलिस की कार्रवाई से कबाड़ियों में हड़कंप जरूर है, लेकिन कार्रवाई का असली असर तभी माना जाएगा, जब छोटे कारोबारियों के साथ शहर के बड़े और प्रभावशाली कबाड़ कारोबारियों के ठिकानों की भी निष्पक्ष जांच हो। सवाल सीधा है—जब चोरी का माल छोटे कबाड़ी से बड़े कबाड़ी तक पहुंचने की आशंका है, तो जांच की कड़ी सिर्फ छोटे दुकानदारों तक क्यों? और सबसे बड़ा सवाल है कि सड़क से करोड़पति बने इन कबाड़ियों के अपराधिक रिकार्ड और आर्थिक संपत्ति की कब जांच होगी जबकि सिरगिट्टी थाने परिसर में कुछ सालो पहले हुई आगजनी की घटना में जली गाड़ियों के अवशेष गायब होना अभी तक रहस्य बना हुआ है  और हाइवे किनारे डिवाइडर में लगे करोड़ो रु की रेलिंग और जालियों के गायब होने की कहानी किसी से छुपी हुई भी नहीं है।

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