
डेस्क खबर बिलासपुर../ प्रदेश के दुसरे सबसे बड़े शहर माने जाने बिलासपुर जिले के शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक खुलेआम सरकारी चावल को अफरातफरी और चोरी की जा रही है। लगातार वीडियो और शिकायतों के बाद भी सरकारी चावल की कालाबाजारी करने वालो के खिलाफ सख्त कार्यवाही नहीं होने से इनके हौसले बुलंद है।जहां एक तरफ शहर के बीचों बीच इलाके में अनाज परिवहन में लगी गाड़ियों में GPS के जरिए चावल का गोलमाल किया जा रहा है और कई दुकानों को आबंटित चावल एक जगह खाली करवा कर बोरिया के जरिए पलटी कर छोटी छोटी गाड़ियों पर लोड कर जमकर मुनाफाखोरी की जा रही है तो दूसरी तरफ मस्तूरी क्षेत्र से अनाज गायब होने का मामला सामने आया है ।

गरीबों की थाली तक चावल पहुंचाने के लिए सरकार व्यवस्था खड़ी करती है, लेकिन मस्तूरी के कोनी गांव से सामने आए आरोपों ने इसी व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों की शिकायत के मुताबिक उचित मूल्य दुकान के स्टॉक में 222 क्विंटल चावल की कथित कमी सामने आई है।
बताया जा रहा है कि दुकान के लिए करीब 245 क्विंटल चावल का आवंटन होता है। ऐसे में यदि 222 क्विंटल की कमी की बात सही है, तो सवाल बेहद बड़ा है—इतना भारी स्टॉक आखिर गया कहां?

ग्रामीणों ने सरपंच राधिका पोर्ते पर सरकारी राशन को कथित तौर पर बेचने का आरोप लगाया है। वहीं खाद्य निरीक्षक मंगेशकांत खान की भूमिका पर भी शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इस संबंध में पहले भी शिकायतें की गईं, लेकिन कार्रवाई अपेक्षित गति से नहीं हुई।
222 क्विंटल कम… फिर 100 क्विंटल की ‘एंट्री’ क्यों?
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब ग्रामीणों ने दावा किया कि कथित कमी के बीच 100 क्विंटल अतिरिक्त चावल कोनी भेजा गया।
अब सवाल यह है—पहले 222 क्विंटल की कमी का हिसाब क्यों नहीं?स्टॉक का भौतिक सत्यापन हुआ या नहीं?जिम्मेदारी तय किए बिना नया स्टॉक भेजने की जरूरत क्यों पड़ी?

‘अंगूठा पहले, राशन बाद में’ या राशन सिर्फ रिकॉर्ड में?
ग्रामीणों ने पीओएस मशीन को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कुछ हितग्राहियों से कथित तौर पर एडवांस में फिंगरप्रिंट लिया गया, लेकिन उन्हें वास्तविक राशन नहीं मिला। यदि जांच में यह आरोप सही पाए जाते हैं, तो पीओएस में दर्ज वितरण और वास्तविक वितरण का अंतर भी सामने आ सकता है।
अब प्रशासन से सीधा सवाल

ग्रामीणों ने मांग की है कि दुकान और गोदाम का भौतिक सत्यापन, स्टॉक रजिस्टर की जांच, आवंटन रिकॉर्ड का मिलान और पीओएस मशीन का पूरा डेटा खंगाला जाए।क्योंकि मामला सिर्फ 222 क्विंटल चावल का नहीं है…मामला गरीब की थाली का है!
222 क्विंटल चावल का हिसाब कौन देगा?
245 क्विंटल में 222 क्विंटल की कथित कमी कैसे हुई?100 क्विंटल अतिरिक्त चावल क्यों भेजा गया?

और पहले की शिकायतों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जांच अगर निष्पक्ष हुई, तो साफ हो जाएगा कि कोनी में यह महज स्टॉक की गड़बड़ी है या गरीबों के राशन से जुड़ा कोई बड़ा खेल।
डंकाराम डॉट कॉम का सवाल—गरीब की थाली का चावल अगर रास्ते में ही गायब हो जाए, तो जवाबदेही आखिर किसकी?
