
डेस्क खबर बिलासपुर../ कहते हैं, मां की गोद में आने के बाद बच्चे की पहली किलकारी पूरे परिवार के लिए सबसे बड़ी खुशी होती है। लेकिन लोरमी की गौसिया परवीन के परिवार के लिए 3 जुलाई 2026 का दिन खुशी के साथ जिंदगी का सबसे कठिन इम्तिहान भी लेकर आया। जन्म के साथ ही उनका नवजात सांस लेने के लिए संघर्ष करने लगा। चेहरे पर जिंदगी की उम्मीद थी, लेकिन सांसों की राह ही जन्म से बंद थी।

नवजात को गंभीर हालत में उसी दिन श्री शिशु भवन हॉस्पिटल, बिलासपुर लाया गया। जांच में पता चला कि बच्चा एक दुर्लभ जन्मजात बीमारी Bilateral Choanal Atresia से पीड़ित है। उसकी दोनों नासिका के पिछले वायुमार्ग जन्म से ही बंद थे।

हर सांस के साथ मंडरा रहा था खतरा
बच्चे की हालत इतनी गंभीर थी कि चिकित्सकों के सामने सबसे पहली चुनौती उसकी सांस और ऑक्सीजन को सामान्य करना था। नन्हा शरीर जिंदगी के लिए संघर्ष कर रहा था और परिवार की हर नजर डॉक्टरों पर टिकी थी।

डॉ. श्रीकांत गिरी के नेतृत्व में चिकित्सकीय टीम ने तत्काल उपचार शुरू किया। बच्चे को करीब एक सप्ताह तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। मशीनों के सहारे चल रही नन्ही सांसों के बीच परिवार की उम्मीद भी उसी के साथ सांस ले रही थी।
स्थिति कुछ स्थिर हुई तो विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बंद वायुमार्ग को खोलने के लिए जटिल सर्जिकल उपचार किया। लेकिन सर्जरी के बाद भी चुनौती खत्म नहीं हुई। बच्चे को लगातार निगरानी, चिकित्सा और विशेष नर्सिंग देखभाल की जरूरत थी।

30 दिन बाद बदली तस्वीर
दिन बीतते गए… डॉक्टरों की निगरानी जारी रही… नर्सिंग स्टाफ हर पल बच्चे की देखभाल में जुटा रहा। करीब 30 दिनों तक चली सतत चिकित्सा और विशेष देखभाल के बाद आखिरकार वह दिन आया, जिसका इंतजार परिवार बेसब्री से कर रहा था।
8 अगस्त 2026 को नवजात को स्वस्थ अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
जिस बच्चे के लिए जन्म के बाद हर सांस चिंता का कारण बनी हुई थी, वही मासूम अब अपनी मां की गोद में था। परिवार की आंखों में इस बार डर नहीं, बल्कि खुशी के आंसू थे।
डॉक्टरों की टीम बनी उम्मीद की वजह
इस कठिन उपचार में डॉ. श्रीकांत गिरी, डॉ. रवि द्विवेदी, डॉ. अंकित ठकराल, डॉ. प्रणव अंधारे, डॉ. विशाल मांझी और डॉ. मोनिका जायसवाल सहित पूरी चिकित्सकीय टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
अस्पताल प्रबंधक नवल वर्मा के मार्गदर्शन में नर्सिंग एवं सपोर्ट स्टाफ ने भी बच्चे की लगातार देखभाल की। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार यह सफलता किसी एक चिकित्सक की नहीं, बल्कि पूरी टीम के समन्वित प्रयास का परिणाम रही।
मां की गोद में लौटी जिंदगी
करीब एक महीने तक अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ने के बाद जब मासूम स्वस्थ होकर घर जाने के लिए तैयार हुआ, तो माता-पिता के लिए वह पल शब्दों से परे था।
जिस बच्चे को जन्म के बाद सांस लेने के लिए मशीनों का सहारा लेना पड़ा था, आज वही बच्चा अपनी मां की गोद में सुरक्षित था।
एक महीने की बेचैनी, हर पल की चिंता और अनगिनत दुआओं के बाद आखिरकार एक मां की गोद फिर से खिल उठी।
यह सिर्फ एक नवजात के स्वस्थ होने की कहानी नहीं, बल्कि उस उम्मीद की कहानी है जो मुश्किल से मुश्किल वक्त में भी परिवार ने नहीं छोड़ी।
नन्ही सांसों ने जिंदगी की जंग जीत ली… और एक परिवार की दुनिया फिर से आबाद हो गई।
