

डेस्क खबर बिलासपुर ../ सरकार गरीबों को राहत देने के लिए मुफ्त और सस्ते चावल की योजना चला रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। राशन दुकानों से निकलकर यही चावल अब खुले बाजार में 25 रुपए प्रति किलो बिक रहा है और पूरा सिस्टम एक संगठित “कमाई के खेल” में तब्दील हो चुका है। खाद्य विभाग के संरक्षण में यह काला साम्राज्य जिले में खूब फल फूल रहा है । सब कुछ पुख्ता प्रमाण सहित मामला उजागर होने के बाद ही खाद्य विभाग इन पर मेहरबान बना हुआ है । घोषणा पत्र के नाम पर हर महीने निश्चित राशि का खेल खुलेआम चल रहा है मीडियाकर्मियों के सामने खाद्य विभाग के दफ्तर पहुंचे एक दुकान संचालक ने बातचीत में जानकारी देते हुए चौंकाने वाला खुलासा किया । घोषणा पत्र का सिस्टम आनलाइन होने के बाद भी घोषणा पत्र के नाम पर एक निश्चित राशि देनी ही पड़ती है नहीं तो वास्तविक भौतिक सत्यापन कर उनकी दुकानों के खिलाफ कार्यवाही का डर बना हुआ रहता है।
नाम न छापने की शर्त और कुछ मीडिया संस्थानों की खबरों के अनुसार हितग्राहियों से सरकारी चावल से 15 रुपए प्रति किलो से लेकर 23 रु तक खरीदा जा रहा है इसके बाद राशन दुकानदार वही चावल व्यापारियों को 20 से लेकर 24 रुपए में बेच देते हैं और सीधे 5 रुपए प्रति किलो का मुनाफा कमा लेते हैं। आगे व्यापारी भी उसी चावल को एक बड़े व्यापारी को ज्यादा दामों में बेचकर बेचकर अपना हिस्सा निकाल रहे हैं। यानी गरीबों के नाम पर मिलने वाला अनाज अब मुनाफे की चेन में फंस गया है।
इस पूरे खेल में सबसे अहम कड़ी है ई-पॉस मशीन। हितग्राही अंगूठा लगाते ही सरकारी रिकॉर्ड में चावल उठाव दिख जाता है, लेकिन असल में चावल की जगह नगद लेनदेन हो रहा है। कागजों में सब कुछ सही, लेकिन जमीन पर पूरा खेल उल्टा। इस मामले के कई सीरीज और पार्ट डंकाराम वेब पोर्टल ने वीडियो सहित प्रमाण के तौर पर खबरों के माध्यम से उजागर कर चुका है ।

खुले बाजार में इस चावल के बड़े खरीदार के बारे में तो दावा यहां तक किया जा रहा है कि राशन दुकानों को वेयर हाउस से आबंटित सरकारी चावल उचित मूल्य की दुकानों में न पहुंचकर कुछ चुनिंदा जगह स्थित गोदामों में खाली कर दिया जाता है। सूत्रों का दावा है कि सिर्फ शहरी क्षेत्रों में संचालित दुकानों का लगभग 50 फीसदी चावल खपाने मेल एक बड़े व्यापारी की भूमिका काफी अहम है। सस्ते में मिल रहा सरकारी चावल उनके लिए फायदे का सौदा बन चुका है। स्थिति यह है कि अब लगभग हर वर्ग के पास एपीएल और बीपीएल कार्ड हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि असली गरीब कौन है और सिस्टम का फायदा कौन उठा रहा है? सबसे गंभीर पहलू यह है कि इस पूरे मामले की जानकारी “सबको” है—राशन दुकानदारों से लेकर अधिकारियों तक। लेकिन कार्रवाई के नाम पर सन्नाटा पसरा हुआ है।

मीडिया की खबरें भी अब खुलकर कह रही है—“अंधेर नगरी, चौपट राजा”। क्योंकि जहां एक ओर सरकारी योजनाओं का दुरुपयोग खुलेआम हो रहा है, वहीं दूसरी ओर अधिकारी से लेकर जनता के लिए आवाज उठाने वाले बड़े-बड़े नेता भी न जाने क्यों चुप्पी साधे हुए हैं। लोगों का कहना है कि यह स्थिति किसी भी हालत में “सुशासन” की नीति नहीं लगती। अगर यही हाल रहा, तो गरीबों के नाम पर चल रही योजनाएं केवल कागजों तक सीमित रह जाएंगी और असली लाभार्थी हमेशा की तरह पीछे छूट जाएगा।

अब सरकार द्वारा तीन महीने का राशन एक साथ दिए जाने से इस खेल के और तेज होने की आशंका जताई जा रही है। एक ही बार में बड़ी मात्रा में चावल मिलने से “काले कारोबार” की चांदी होना तय माना जा रहा है। एक प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित बयान के अनुसार बिलासपुर जिला खाद्य नियंत्रक अमृत कुजूर के अनुसार ऐसी गतिविधि अपराध की श्रेणी में आती हैं और जानकारी मिलने पर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन बड़ा सवाल वही—जब सब कुछ सामने है,प्रमाण है तो कार्रवाई आखिर कब तक ? इतना ही नहीं खाद्य नियंत्रक से इस मामले में कई बार आन कैमरा बात करने की कोशिश भी की गई लेकिन खाद्य नियंत्रक कैमरे के सामने कुछ भी बोलने से हमेशा इंकार करते नजर आते है इतना ही नहीं किसी मामले की जानकारी लेने के लिए फोन रिसीव करना भी मुनासिब नहीं समझते है। चुनिंदा चावल चोर गिरोह के सरगना विक्रेता संघ अध्यक्ष ऋषि उपाध्याय के खिलाफ 6 जून को प्रसारित खबर के बाद तत्कालीन खाद्य नियंत्रक की जांच रिपोर्ट में की गई कार्यवाही मामले में मीडिया को आधा अधूरा सच बताकर मामले में पूरी चर्चा से बचते नजर आते है ,हालांकि इस मामले में ऋषि उपाध्याय के खिलाफ कोर्ट के आदेश के बाद बहाल की गई दुकान से संबंधित जानकारी लेने के लिए विभाग में सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई है ताकि ऋषि उपाध्याय मामले का पूरा और असल सच सामने आ सके। इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात है कि 6 जून के बाद भी ऋषि उपाध्याय का बेटा और स्वयं ऋषि उपाध्याय कैमरे में चावल के बदले नगद पैसा देते हुए कई बार कैद भी हो चुके है । वावजूद उसके खिलाफ कार्यवाही नहीं होने से लगातार उसकी सरकारी उचित मूल्य की दुकान के खिलाफ कार्यवाही नहीं होने से विभाग की साख पर सवाल खड़े हो रहे है ।

यह सिर्फ चावल की हेराफेरी नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी और मिलीभगत की कहानी है। गरीबों के हक का अनाज बाजार में बिक रहा है, और जिम्मेदार लोग चुप हैं—यही आज की सबसे बड़ी सच्चाई बन चुकी है।