डेस्क खबरबिलासपुर

खाकी की साख पर सवाल! डिजिटल पुलिसिंग के दावों के बीच वसूली के आरोप, आखिर दागी पुलिसकर्मियों पर मेहरबानी क्यों? क्या खाकी के लिए अलग है कानून ??



डेस्क खबर बिलासपुर../  बिलासपुर पुलिस एक तरफ डिजिटल पुलिसिंग, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करती है, तो दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों पर लग रहे कथित वसूली और भ्रष्टाचार के आरोप विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।एसएसपी रजनेश सिंह अपनी सख्त कार्यशैली और अनुशासन के लिए पहचाने जाते हैं। उनके कार्यकाल में भ्रष्टाचार और लापरवाही के मामलों में पुलिसकर्मियों पर लाइन अटैच से लेकर कड़ी विभागीय कार्रवाई तक हुई है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई के बाद भी विवादों में घिरे पुलिसकर्मी कुछ ही दिनों में दोबारा थानों में कैसे पहुंच जाते हैं? जिले में अभी भी दर्जनों कई ऐसे खाकीधारी है जिनकी लगातार एक ही थानों या जिले में नियुक्ति को लेकर विभागीय चर्चा बनी रहती है। कई सिपाही एक ही थाने में वर्षों से जमे होने की चर्चा भी अब आम बात हो गई है।



सबसे बड़ा सवाल ढोलाराम मरकाम प्रकरण को लेकर है। इस मामले में जांच कहां तक पहुंची और जांच रिपोर्ट के आधार पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? वहीं, होटल में कथित तौर पर रुपये लेते पुलिसकर्मियों के वायरल वीडियो का मामले में पुलिस ने अपना स्पष्टीकरण विज्ञप्ति के जरिए जारी कर इन्हें पुलिसकर्मी होने से साफ इंकार कर दिया है। मामला नवंबर 2025 का है। सिम्स चौकी में पदस्थ ASI ढोलाराम मरकाम पर पोस्टमार्टम और शव सौंपने के नाम पर पैसे मांगने का आरोप लगा था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, शव सौंपने के लिए 500 से 800 रुपये और जल्द पोस्टमार्टम कराने के नाम पर 20 हजार रुपये मांगे गए थे। आरोप यह भी था कि रकम साइकिल स्टैंड संचालक के UPI नंबर पर मंगाई गई थी। शिकायतकर्ता ने भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड भी पुलिस अधिकारियों को सौंपे थे।शिकायत सामने आने के बाद तत्कालीन SSP रजनेश सिंह ने ASI को निलंबित कर दिया था। बाद में बहाली के बाद उनकी पदस्थापना मस्तूरी थाने में कर दी गई।दूसरा मामला मस्तूरी थाने से जुड़ा है। यहां अवैध शराब के आरोपियों से पैसे लेने और जमानती धाराओं में कार्रवाई का भरोसा देने के बाद गैर-जमानती धाराओं में केस दर्ज करने की शिकायत सामने आई थी। दोनों मामलों में शिकायत के बाद जांच की बात कही गई। IPS अधिकारी ने भी जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंप दी, लेकिन अब सवाल यह है कि जांच रिपोर्ट में क्या सामने आया और उसके आधार पर आगे क्या कार्रवाई हुई? सवाल सिर्फ दो मामलों का नहीं कई मीडिया रिपोर्ट, शिकायत ,आडियो वीडियो के पुख्ता साक्ष्य होने के बाद भी ऐसे पुलिसकर्मियों की बार बार तैनाती होने पर सवाल खड़े होना तो लाजमी है।



आखिर बार-बार शिकायतें सामने आने के बाद भी ऐसे मामलों का अंतिम नतीजा जनता के सामने क्यों नहीं आता? क्या लाइन अटैच करना ही विभाग की अंतिम कार्रवाई है या फिर जांच पूरी होने के बाद दोषियों को वास्तव में सजा भी मिलती है?
इसका असर उन ईमानदार पुलिसकर्मियों पर भी पड़ता है, जो पूरी निष्ठा से अपनी ड्यूटी निभाते हैं। जब आरोपों से घिरे कर्मचारियों पर कार्रवाई का स्पष्ट नतीजा सामने नहीं आता, तो विभाग की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब सवाल सीधे पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से है—क्या इन मामलों की समयबद्ध जांच कर दोषियों पर ठोस कार्रवाई होगी? या फिर कुछ दिनों की प्रशासनिक कार्रवाई के बाद मामले ठंडे बस्ते में चले जाएंगे? डिजिटल पुलिसिंग के दौर में सिर्फ तकनीक और दावों से पारदर्शिता साबित नहीं होगी। इसके लिए जरूरी है कि पुलिस महकमे के भीतर भी जवाबदेही तय हो और कार्रवाई का नतीजा जनता के सामने आए। आखिर खाकी की साख बचाने की जिम्मेदारी भी उसी महकमे की है ताकि कानून का भरोसा जनता पर कायम रहे ।

error: Content is protected !!