4.51 करोड़ के कथित गबन ने खोली शिक्षा विभाग की पोल! DEO पर गंभीर आरोप, जांच में भी अनियमितताओं की पुष्टि का दावा

डेस्क खबर बलरामपुर। बच्चों की शिक्षा और सरकारी व्यवस्था सुधारने के लिए आने वाले करोड़ों रुपये पर ही अगर सवाल उठने लगें, तो जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। जिला शिक्षा विभाग में 4 करोड़ 51 लाख रुपये के कथित गबन और नियम विरुद्ध खरीदी का मामला सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।
मामले के केंद्र में हैं जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव, जिन पर नियमों को दरकिनार कर सरकारी राशि से खरीदी किए जाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मामला सामने आने के बाद वाड्रफनगर के अधिवक्ता अभिषेक यादव ने कलेक्टर से शिकायत कर पूरे प्रकरण की जांच की मांग की थी।
शिकायत को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने जांच टीम गठित की। अब दावा किया जा रहा है कि जांच में शिकायत में लगाए गए आरोपों और वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि हुई है। इसके बाद जांच टीम ने जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा कर दी है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। जांच टीम ने निलंबन के साथ बैंक खाते पर होल्ड लगाने तक की अनुशंसा की है। यानी जांच में सामने आए आरोपों को प्रशासन ने कितना गंभीर माना, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।

करोड़ों की रकम पर सवाल, अब जवाबदेही किसकी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकारी खजाने से जुड़े 4.51 करोड़ रुपये के मामले में नियमों की कथित अनदेखी कैसे हुई? खरीदी की प्रक्रिया किसकी निगरानी में हुई? भुगतान किस आधार पर किया गया? और अगर जांच में अनियमितताएं सामने आई हैं, तो इसकी जवाबदेही तय करने में देरी क्यों?
इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की वित्तीय व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस विभाग पर बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी है, उसी विभाग में करोड़ों की कथित वित्तीय गड़बड़ी के आरोप बेहद गंभीर हैं।
मंत्री के आश्वासन के बाद अब कार्रवाई का इंतजार
मामले को लेकर प्रभारी मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। अब देखना होगा कि जांच टीम की अनुशंसा पर प्रशासन कितनी तेजी और कितनी सख्ती से कार्रवाई करता है।
4 करोड़ 51 लाख रुपये का यह मामला सिर्फ एक अधिकारी पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है—यह पूरे सिस्टम की जवाबदेही का सवाल है। अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई जरूरी है जो सरकारी धन के दुरुपयोग करने वालों के लिए स्पष्ट संदेश बने।
अब सवाल सिर्फ जांच का नहीं, कार्रवाई का है—क्या 4.51 करोड़ के इस कथित खेल में जिम्मेदार अधिकारियों पर वास्तव में गाज गिरेगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
4.51 करोड़ के कथित गबन ने खोली शिक्षा विभाग की पोल! DEO पर गंभीर आरोप, कलेक्टर जांच में पुष्टि का दावा.! मंत्री ने दिया दोषियों खिलाफ सख्त एक्शन का आश्वासन ..
डेस्क खबर बलरामपुर। बच्चों की शिक्षा और सरकारी व्यवस्था सुधारने के लिए आने वाले करोड़ों रुपये पर ही अगर सवाल उठने लगें, तो जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है। जिला शिक्षा विभाग में 4 करोड़ 51 लाख रुपये के कथित गबन और नियम विरुद्ध खरीदी का मामला सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मचा हुआ है।
मामले के केंद्र में हैं जिला शिक्षा अधिकारी मनीराम यादव, जिन पर नियमों को दरकिनार कर सरकारी राशि से खरीदी किए जाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मामला सामने आने के बाद वाड्रफनगर के अधिवक्ता अभिषेक यादव ने कलेक्टर से शिकायत कर पूरे प्रकरण की जांच की मांग की थी।
शिकायत को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने जांच टीम गठित की। अब दावा किया जा रहा है कि जांच में शिकायत में लगाए गए आरोपों और वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि हुई है। इसके बाद जांच टीम ने जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा कर दी है।
मामला यहीं खत्म नहीं होता। जांच टीम ने निलंबन के साथ बैंक खाते पर होल्ड लगाने तक की अनुशंसा की है। यानी जांच में सामने आए आरोपों को प्रशासन ने कितना गंभीर माना, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है।
करोड़ों की रकम पर सवाल, अब जवाबदेही किसकी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सरकारी खजाने से जुड़े 4.51 करोड़ रुपये के मामले में नियमों की कथित अनदेखी कैसे हुई? खरीदी की प्रक्रिया किसकी निगरानी में हुई? भुगतान किस आधार पर किया गया? और अगर जांच में अनियमितताएं सामने आई हैं, तो इसकी जवाबदेही तय करने में देरी क्यों?
इस पूरे मामले ने शिक्षा विभाग की वित्तीय व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस विभाग पर बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी है, उसी विभाग में करोड़ों की कथित वित्तीय गड़बड़ी के आरोप बेहद गंभीर हैं।
मंत्री के आश्वासन के बाद अब कार्रवाई का इंतजार
मामले को लेकर प्रभारी मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने कार्रवाई का आश्वासन दिया है। अब देखना होगा कि जांच टीम की अनुशंसा पर प्रशासन कितनी तेजी और कितनी सख्ती से कार्रवाई करता है।
4 करोड़ 51 लाख रुपये का यह मामला सिर्फ एक अधिकारी पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है—यह पूरे सिस्टम की जवाबदेही का सवाल है। अगर जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो दोषियों पर ऐसी कार्रवाई जरूरी है जो सरकारी धन के दुरुपयोग करने वालों के लिए स्पष्ट संदेश बने। अब सवाल सिर्फ जांच का नहीं, कार्रवाई का है—क्या 4.51 करोड़ के इस कथित खेल में जिम्मेदार अधिकारियों पर वास्तव में गाज गिरेगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



