नक्सल हिंसा पर बयान से भडके पीडित, बोले पीडा को समझे बिना टिप्पणी करना आसान ..माओवादी हिंसा के पीडितों ने कांग्रेस नेता से मांगा जवाब !



डेस्क खबर रायपुर../ नक्सल हिंसा को लेकर पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री और कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम के बयान के बाद पीडित परिवारों में नाराजगी देखने को मिल रही है। बस्तर शांति समिति के बैनर तले नक्सल हिंसा से प्रभावित लोगों ने दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सवाल उठाया कि जिन लोगों ने वर्षों तक हिंसा का दंश झेला है, उनकी पीडा को केवल वैचारिक बहस के नजरिए से कैसे देखा जा सकता है।पीडितों का कहना है कि नक्सलवाद उनके लिए कोई राजनीतिक या सैद्धांतिक मुद्दा नहीं रहा। यह उनके परिवार, रोजगार, शिक्षा और सामान्य जीवन को प्रभावित करने वाला ऐसा संकट रहा है, जिसकी पीडा आज भी अनेक परिवारों के साथ जुडी हुई है।
गोली और हिंसा के निशान आज भी कायम
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीडितों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि नक्सली हिंसा ने कई परिवारों को कभी न भरने वाले जख्म दिए हैं। गौतरीहा राम विश्वकर्मा को वर्ष 2009 में नक्सलियों ने गोली मारी थी। इसी तरह सियाराम रामटेक की वर्ष 2022 में खेत पर काम करने के दौरान गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।पीडितों ने बताया कि कई लोग आज भी गोलियों और हिंसा के कारण बैसाखी या व्हीलचेयर के सहारे जीवन गुजार रहे हैं। सुरक्षा बलों के जवान भी इस संघर्ष में शहीद हुए हैं। सीआरपीएफ के जवान रूपेश सिंह जनवरी में आईईडी विस्फोट में अपना पैर गंवा बैठे। उनका कहना है कि नक्सली हिंसा की कीमत केवल आंकडों से नहीं आंकी जा सकती, क्योंकि इसके पीछे किसी व्यक्ति का शरीर, परिवार और पूरा भविष्य प्रभावित होता है।
माओवादी हिंसा के पीडितों ने चिदंबरम से मांगा जवाब
पीडितों ने सवाल उठाया कि जिन लोगों ने हिंसा में अपने परिजनों को खोया, उनके घर उजडे और जीवन की दिशा बदल गई, उनके दर्द को समझे बिना नक्सलवाद पर टिप्पणी करना कितना उचित है। उनका कहना है कि हिंसा से प्रभावित बस्तर के ग्रामीण, आदिवासी, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और सुरक्षा बलों के जवान वर्षों से इसका सीधा असर झेलते रहे हैं।
पीडितों ने कहा कि अब बस्तर को हिंसा से बाहर निकलकर शांति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सडक और विकास की जरूरत है। उनका मानना है कि क्षेत्र के लोगों की प्राथमिकता सामान्य जीवन की वापसी है, न कि लगातार संघर्ष और हिंसा का वातावरण।
दिल्ली में पीडितों ने उठाई आवाज
दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान माओवादी हिंसा से प्रभावित लोगों ने पोस्टर और दस्तावेजों के माध्यम से अपनी पीडा सामने रखी। उन्होंने कहा कि बस्तर की वास्तविक तस्वीर उन लोगों से समझी जानी चाहिए, जिन्होंने हिंसा को अपने जीवन में झेला है।पीडितों का कहना है कि हिंसा का असर केवल घटना के समय तक सीमित नहीं रहता। किसी व्यक्ति की मृत्यु, गंभीर चोट या अपंगता के बाद उसके परिवार की आर्थिक स्थिति, बच्चों की पढाई और भविष्य पर भी लंबे समय तक प्रभाव पडता है।
अब बस्तर शांति और विकास की राह पर बढना चाहता है
बस्तर शांति समिति का कहना है कि क्षेत्र के लोग अब हिंसा के साये से बाहर निकलना चाहते हैं। उनकी मांग है कि बस्तर में शांति के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार के अवसर, बेहतर सडक और विकास की योजनाएं तेजी से आगे बढें।
समिति ने कहा कि नक्सल हिंसा से जुडे किसी भी विमर्श में सबसे पहले उन परिवारों की आवाज सुनी जानी चाहिए, जिन्होंने इसकी कीमत चुकाई है। पीडितों के अनुसार बस्तर के लोगों की सबसे बडी जरूरत अब सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन है।














