


डेस्क खबर बिलासपुर./ बिलासपुर जिले की चर्चित भैंसाझार बराज मुआवजा गड़बड़ी प्रकरण में प्रशासनिक कार्रवाई जितनी आगे बढ़ रही है, उतने ही बड़े सवाल भी खड़े हो रहे हैं। करोड़ों रुपये के कथित अनियमित मुआवजा वितरण में जहां कई अधिकारियों के कार्यकाल का उल्लेख सामने आया है, वहीं अब तक कार्रवाई सीमित दायरे में ही दिखाई दे रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में अनियमितताओं के आधार पर जांच चल रही है, तो कथित रूप से लाभ लेने वाले लोगों और पूरे प्रकरण में जिम्मेदार सभी अधिकारियों के खिलाफ अब तक एफआईआर क्यों दर्ज नहीं हुई?
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, कई गांवों में बिना आवश्यक प्रकाशन खसरों को शामिल करने और रकबा बढ़ाकर मुआवजा स्वीकृत किए जाने जैसी अनियमितताओं का उल्लेख किया गया है। संबंधित अवधि में 11 एसडीएम के कार्यकाल का जिक्र होने के बावजूद कार्रवाई का दायरा सीमित रहने पर सवाल उठ रहे हैं।

कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि जांच में सरकारी धन के दुरुपयोग, फर्जीवाड़े या षड्यंत्र के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक प्रकरण दर्ज कर लाभार्थियों और दोषी अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होना स्वाभाविक प्रक्रिया मानी जाती है। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि क्या जांच केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित रहेगी या फिर आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जाएगी?
अब निगाहें संभागीय जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि रिपोर्ट में अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या सिर्फ कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई कर मामले को सीमित कर दिया जाएगा, या सरकारी खजाने को कथित नुकसान पहुंचाने वाले सभी जिम्मेदार अधिकारियों और कथित लाभार्थियों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई होगी?
फिलहाल यह मामला केवल मुआवजा गड़बड़ी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी धन की सुरक्षा और कानून के समान अनुपालन की कसौटी बन चुका है।
भैंसाझार बराज के करोड़ों रुपये के मुआवजा वितरण में कथित गड़बड़ियों के दस्तावेजों में यदि 11 एसडीएम के कार्यकाल में अनियमितताओं का उल्लेख है, तो कार्रवाई का डंडा सिर्फ एक अधिकारी आनंदरूप तिवारी पर ही क्यों चला? आखिर बाकी अधिकारियों को किस आधार पर जांच और जवाबदेही से बाहर रखा गया?
रिकॉर्ड में कई अधिकारियों के कार्यकाल के दौरान बिना प्रकाशन खसरों को शामिल करने, रकबा बढ़ाने और मुआवजा बढ़ाने जैसी अनियमितताओं का उल्लेख बताया गया है। इसके बावजूद अब तक किसी अन्य अधिकारी के खिलाफ वैसी कार्रवाई सामने नहीं आई, जैसी आनंदरूप तिवारी के खिलाफ हुई। यही वह बिंदु है, जिसने पूरी जांच की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून का तराजू सभी अधिकारियों के लिए अलग-अलग है? यदि मुआवजा वितरण की प्रक्रिया सामूहिक प्रशासनिक निर्णयों के तहत हुई थी, तो जवाबदेही भी सामूहिक होनी चाहिए थी। और यदि दोष केवल एक अधिकारी का था, तो फिर बाकी अधिकारियों के कार्यकाल में दर्ज कथित अनियमितताओं की अनदेखी क्यों की गई?
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि क्या पूरे मामले में एक अधिकारी को ‘बलि का बकरा’ बनाकर बाकी जिम्मेदारियों पर पर्दा डालने की कोशिश की गई? यदि जांच निष्पक्ष है तो फिर सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका समान पैमाने पर जांच के दायरे में क्यों नहीं लाई गई?
प्रशासनिक हलकों में यह सवाल भी चर्चा का विषय
प्रकाशित गड़बड़ी का विवरण
राजेंद्र गुप्ता 3 गाँव 5 खसरे बिना धारा 11/19 के प्रकाशन शामिल, 2 का रकबा बढ़ाया
नूतन कंवर 2 गाँव 5 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 14 का रकबा बढ़ाया
दिलेराम दाहिरे 16 गाँव 72 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 42 का रकबा बढ़ाया
देवेंद्र पटेल 7 गाँव 60 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 20 का रकबा बढ़ाया
कीर्तिमान सिंह राठौर 27 गाँव 107 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 70 का रकबा बढ़ाया
आशुतोष चतुर्वेदी 7 गाँव 82 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 42 का रकबा बढ़ाया
देवेश कुमार ध्रुव 1 गाँव 13 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 20 का रकबा बढ़ाया
एस.पी. वैद्य 6 गाँव 23 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 12 का रकबा बढ़ाया
वीरेंद्र लकड़ा 1 गाँव 5 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 8 का रकबा बढ़ाया
अखिलेश साहू 7 गाँव 30 खसरे बिना प्रकाशन शामिल, 5 का रकबा बढ़ाया
उपलब्ध दस्तावेजों एवं साक्ष्यों के आधार पर विभिन्न अधिकारियों के कार्यकाल में कई गांवों और खसरों को बिना प्रकाशन सूची में शामिल किया गया तथा कई मामलों में मुआवजा राशि बढ़ाई गई। इनमें प्रमुख रूप से राजेंद्र गुप्ता, नूतन कंवर, दिलेराम डाहिरे, देवेंद्र पटेल, कीर्तिमान सिंह राठौर, आशुतोष चतुर्वेदी, देवेश कुमार ध्रुव, एसपी वैद्य, वीरेंद्र लकड़ा और अखिलेश साहू के कार्यकाल का उल्लेख किया गया है। बिलासपुर संभाग के आयुक्त ने कहा है कि पूरे मामले की जांच रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर प्रस्तुत किए जाने की संभावना है। रिपोर्ट आने के बाद आगे की कार्रवाई तय होगी।