
डेस्क खबर बिलासपुर ./ बिलासपुर जिले से सटे मुंगेली जिले में राज्य कर विभाग (GST) की ताबड़तोड़ कार्रवाई से व्यापारिक प्रतिष्ठानों में हड़कंप मचा हुआ है। कच्चे बिल काटकर कथित तौर पर टैक्स बचाने की शिकायतों के बाद विभाग ने कई प्रतिष्ठानों पर जांच और कार्रवाई की है। इस कार्रवाई में बलानी चौक स्थित मोनिका ज्वेलर्स, पड़ाव चौक स्थित दिनेश ज्वेलर्स और धरमपुरा मेन रोड स्थित नुक्कड़ ढाबा का नाम सामने आया है। नुक्कड़ ढाबा पर विभाग द्वारा 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाए जाने की जानकारी है।

शिकायत के आधार पर हुई जांच में कच्चे बिल से जुड़े मामले सामने आने की बात कही जा रही है। विभाग के अनुसार संबंधित फर्म की ओर से बिल जारी किए जाने की बात स्वीकार की गई है। यदि बिना विधिवत GST बिल के लेन-देन कर कर बचाने का प्रयास हुआ है, तो इससे सरकार के राजस्व को नुकसान पहुंचने का मामला बनता है।


वहीं पड़ाव चौक स्थित वैष्णव मिष्ठान भंडार (बावा होटल) पर विभाग की कार्रवाई सबसे बड़ी बताई जा रही है। संयुक्त आयुक्त GST बिलासपुर महेंद्र कुमार धनेलिया के अनुसार बावा होटल पर 60 लाख रुपए की जुर्माना और टैक्स संबंधी कार्रवाई की गई है और gst चोरी सिद्ध होने पर पूरे जुर्माने की राशि की वसूली कर ली गई है और यह राशि सरकारी खजाने में जमा भी करवा दी गई है। विभागीय अधिकारी ने यह भी बताया कि कच्चे बिल से जुड़े कुछ अन्य प्रतिष्ठानों पर भी कार्रवाई की गई है। हालांकि पूरी कार्यवाही की स्पष्ट जानकारी देने में अधिकारी आनाकानी करते नजर आये।
लेकिन कार्रवाई के बाद अब पारदर्शिता पर सवाल
मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किन-किन प्रतिष्ठानों पर किस आधार पर कितनी GST देनदारी या जुर्माना निर्धारित किया गया? शिकायतकर्ता द्वारा कार्रवाई से संबंधित दस्तावेज और पूरा विवरण मांगे जाने पर GST विभाग की ओर से धारा 158 का हवाला देते हुए दस्तावेज उपलब्ध कराने में असमर्थता जताई गई।
यहीं से पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि मामला सीधे तौर पर जनता और सरकारी राजस्व से जुड़े टैक्स का है, इसलिए विभाग को कार्रवाई का स्पष्ट और तथ्यात्मक विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।
फिलहाल विभाग की कार्रवाई से यह संकेत जरूर मिला है कि कच्चे बिल और संभावित GST अनियमितताओं को लेकर अब मुंगेली में शिकंजा कसा जा रहा है। हालांकि, अन्य प्रतिष्ठानों में भी इसी तरह की अनियमितताएं हैं या नहीं, यह जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगा। अब सवाल सिर्फ कार्रवाई का नहीं, बल्कि कार्रवाई के बाद तैयार किए गए सरकारी दस्तावेजों को पब्लिक डोमेन में रखने का है !
