


बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान न्यायिक प्रक्रिया का सख्ती से पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि यदि किसी आरोपी ने आरोप तय होने से पहले डिस्चार्ज (मुक्ति) के लिए आवेदन प्रस्तुत किया है, तो उस पर पहले आदेश देना न्यायालय की कानूनी जिम्मेदारी है। इसके बाद ही आरोप तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
डिवीजन बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि संबंधित विशेष अदालत ने डिस्चार्ज आवेदन लंबित रहते हुए सीधे आरोप तय कर दिए थे। हाई कोर्ट ने इस प्रक्रिया को उचित नहीं माना और भविष्य में ऐसी चूक से बचने की स्पष्ट टिप्पणी की। हालांकि, मामले के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद अदालत ने एफआईआर और आरोप पत्र को निरस्त करने की मांग स्वीकार नहीं की और याचिका खारिज कर दी।
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के एक स्कूल से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, एक छात्रा ने अपने खेल शिक्षक पर गंभीर आरोप लगाए थे। बाद में छात्रा और उसके परिजनों ने आरोप लगाया कि अदालत से लौटते समय शिक्षक के परिजनों ने उन्हें रास्ते में रोककर जातिसूचक टिप्पणी की और गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने संबंधित धाराओं में अपराध दर्ज कर जांच शुरू की थी।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी निचली अदालतों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है कि आपराधिक मामलों में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया जाना न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।