


डेस्क खबर बिलासपुर ../कोटा के ग्राम अमाली प्रस्तावित औद्योगिक परियोजना को लेकर अमाली गांव में आयोजित जनसुनवाई शनिवार को विरोध के मंच में तब्दील हो गई। बड़ी संख्या में पहुंचे ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और किसानों ने परियोजना के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। जनसुनवाई के दौरान बार-बार एक ही सवाल गूंजता रहा—”विकास के नाम पर विनाश के लिए आखिर कोटा क्षेत्र को ही क्यों चुना जाता है?”
सभा में मौजूद महिलाओं और बुजुर्गों ने हाथ उठाकर परियोजना का विरोध जताया। ग्रामीणों का कहना था कि जिस क्षेत्र में आज भी सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवागमन जैसी मूलभूत समस्याएं बरकरार हैं, वहां नई परियोजना स्थानीय लोगों के लिए राहत नहीं बल्कि नई मुसीबत लेकर आएगी। लोगों ने आशंका जताई कि परियोजना से जंगल, वन्यजीव, जलस्रोत और ग्रामीण परिवेश प्रभावित होगा।
जनसुनवाई के दौरान कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पांचवीं अनुसूची और पेसा एक्ट जैसे महत्वपूर्ण कानूनों की अनदेखी की जा रही है। आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की सहमति के बिना विकास के नाम पर फैसले थोपे जा रहे हैं। ग्रामीणों ने कहा कि यदि कानून का पालन हो रहा है तो स्थानीय लोगों की आपत्तियों को गंभीरता से क्यों नहीं लिया जा रहा।
सभा में माहौल उस समय और गर्म हो गया जब किसानों ने जमीन खरीदी और अधिग्रहण प्रक्रिया को लेकर गंभीर आरोप लगाए। कई किसानों ने दावा किया कि दबाव बनाकर जमीन खरीदी गई, खेतों तक पहुंचने वाले रास्ते बंद कर दिए गए और कुछ मामलों में बिना भुगतान के खेतों को पाट दिया गया। किसानों ने आरोप लगाया कि दलालों और कंपनी से जुड़े लोगों द्वारा ग्रामीणों पर लगातार दबाव बनाया जा रहा है।
कुछ ग्रामीणों ने भावुक होते हुए कहा कि बरसात के दिनों में बच्चों को स्कूल और कॉलेज पहुंचने के लिए जान जोखिम में डालनी पड़ती है, लेकिन इन समस्याओं का समाधान करने के बजाय क्षेत्र में नई परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जा रही है। “अब देखने और सहने की क्षमता नहीं बची है साहब”—यह बात कई ग्रामीणों की पीड़ा बनकर जनसुनवाई में सुनाई दी।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि जनसुनवाई स्थल पर बड़ी संख्या में बाउंसर और बाहरी लोगों की मौजूदगी ने भय का वातावरण बनाया। लोगों ने सवाल उठाया कि यदि जनसुनवाई जनता की राय जानने के लिए थी तो फिर सुरक्षा के नाम पर इतना दबावपूर्ण माहौल क्यों बनाया गया। कुछ लोगों ने दावा किया कि जनसुनवाई निजी भूमि पर आयोजित की गई, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो गए।
इस दौरान “छत्तीसगढ़िया सबसे बढ़िया” के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। ग्रामीणों ने कलेक्टर समेत प्रशासनिक अधिकारियों को गांव आकर वास्तविक स्थिति देखने का खुला न्योता दिया और कहा कि कागजों से नहीं, जमीन पर उतरकर गांव की सच्चाई समझनी होगी।
जनसुनवाई खत्म होने के बाद भी ग्रामीणों का आक्रोश कम नहीं हुआ। लोगों ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि उनकी आपत्तियों, अधिकारों और आजीविका से जुड़े सवालों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। वही नियमों के विरुद्ध कोलवासरी खुलने पर कांग्रेसी नेताओं ने हाईकोर्ट जाने की बात भी कही है।