
डेस्क खबर बिलासपुर ../ केंद्रीय विद्यालय संगठन (KVS) में एक सेवानिवृत्त शिक्षक द्वारा उठाया गया मामला न केवल एक व्यक्ति के साथ हुए कथित अन्याय की कहानी है, बल्कि यह पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। बिलासपुर के सरकंडा थाना क्षेत्र के राजकिशोर नगर निवासी 75 वर्षीय कृष्णकांत तिवारी का आरोप है कि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट और बाध्यकारी आदेश के बावजूद KVS के कुछ अधिकारियों ने जानबूझकर उनके अधिकारों का हनन किया और वर्षों तक उन्हें वैध सेवा एवं आर्थिक लाभों से वंचित रखा। पत्रकारों से आपसी बातचीत में रिटायर्ड शिक्षक का कहना है कि उनके लिए यह शिक्षकों के सम्मान और उनके अधिकारियों की लड़ाई है और इसके लिए वे जल्द ही बिलासपुर कलेक्टर कार्यालय के सामने धरने में बैठने की तैयारी में जुटे हुए है । बुजुर्ग शिक्षक ने आरोप लगाया है कि बिलासपुर एसपी ऑफिस से लेकर सरकंडा थाने तक उन्हें चक्कर लगवाया जा रहा है लेकिन उन्हें इंसाफ नहीं मिल रहा है ।

शिक्षक तिवारी के अनुसार, वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि उन्हें 1 अगस्त 1989 से वेतन संरक्षण का लाभ दिया जाए। आदेश में यह भी कहा गया था कि उनकी पूरी सेवा अवधि, वरिष्ठता और उससे जुड़े सभी लाभों को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई की जाए। हालांकि 2014 में KVS द्वारा एक औपचारिक आदेश जारी किया गया, लेकिन आरोप है कि यह आदेश केवल कागज़ों तक सीमित रहा और जमीनी स्तर पर इसका वास्तविक पालन नहीं हुआ। शिक्षक का दावा है कि पदोन्नति और वेतन संबंधी लाभों को वर्षों तक जानबूझकर रोका गया। इस देरी का सीधा असर न केवल उनकी आर्थिक स्थिति पर पड़ा, बल्कि उनकी सेवा गरिमा और सम्मान को भी ठेस पहुंची। तिवारी का यह भी आरोप है कि जब मामला अदालत में विचाराधीन था, तब अधिकारियों द्वारा भ्रामक और तथ्यहीन हलफनामे पेश किए गए, जिनमें यह दर्शाने की कोशिश की गई कि उन्हें सभी लाभ पहले ही दिए जा चुके हैं। कृष्णकांत तिवारी इस पूरे घटनाक्रम को महज़ प्रशासनिक चूक नहीं मानते। उनका कहना है कि यह एक सोची-समझी दुर्भावना का परिणाम है, जिसमें कुछ अधिकारियों ने निजी स्वार्थ या सत्ता के दुरुपयोग के तहत न्यायालय के आदेशों की अवहेलना की। वे इसे “संगठित शोषण” करार देते हैं, जो न केवल उनके साथ अन्याय है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की नैतिकता पर भी सवालिया निशान लगाता है।
75 वर्ष की उम्र में भी तिवारी का संघर्ष थमा नहीं है। वे लगातार विभागीय जांच, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान और उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह लड़ाई सिर्फ उनके वेतन या पद की नहीं, बल्कि उन सभी शिक्षकों के अधिकारों की है जो वर्षों तक सिस्टम से न्याय की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं।
यह मामला एक बड़ा प्रश्न छोड़ जाता है—क्या व्यवस्था सच में आत्ममंथन करेगी? क्या न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करने वालों पर जवाबदेही तय होगी? या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा?
फिलहाल इतना तय है कि शिक्षकों के अधिकार और सम्मान ही किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूत नींव होते हैं, और इस नींव को कमजोर करने की कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ती है।