डेस्क खबर

*जी.पी.एम. में तत्कालीन कलेक्टर के वेतन रोकने आदेश से छात्रावास अधीक्षक हो रहे शोषण का शिकार*

_छात्रावास अधीक्षक शिक्षकों को 2 कालखंड पढ़ाना अनिवार्य, प्रमाण पत्र के बाद ही होगा वेतन आहरण_



डेस्क खबर *पेन्ड्रा / गौरेला।*तत्कालीन जिला कलेक्टर लीना मंडावी  गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही द्वारा छात्रावास अधीक्षक के रूप में कार्यरत शिक्षकों के वेतन आहरण को लेकर तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मांडवी द्वारा 24 अप्रैल 2026 को जारी आदेश क्रमांक 327/शि/वेतन आहरण/2026-27 में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे  कि जिन शिक्षकों के द्वारा छात्रावास में अधीक्षक का कार्य किया जा रहा है, उन्हें अपने छात्रावास दायित्व के साथ-साथ अपने मूल विद्यालय में उपस्थिति देकर 02 कालखंड अध्यापन कार्य कराना अनिवार्य है।इस आदेश के कारण छात्रावास अधीक्षक शोषण का शिकार हो रहे हैं।

आदेश में उल्लेख है कि इस संबंध में शिकायत प्राप्त हुई है कि शिक्षकों द्वारा अपनी मूल संस्था में अध्यापन कार्य नहीं किया जा रहा है, जिससे अध्ययनरत छात्र-छात्राओं का अध्यापन प्रभावित हो रहा है। इसी को गंभीरता से लेते हुए कलेक्टर ने निर्देशित किया था कि संबंधित संस्था में अध्यापन एवं उपस्थिति का प्रमाण पत्र संस्था प्रमुख से प्राप्त करने के उपरांत ही इन शिक्षकों के वेतन आहरण की कार्यवाही सुनिश्चित की जाए, यही प्रमाणपत्र श अधीक्षकों के शोषण की वजह बना हुआ है।



*आदेश की मंशा सही, पर क्रियान्वयन कितना व्यावहारिक?*

कलेक्टर के इस आदेश की मंशा पर कोई सवाल नहीं है। मंशा है कि स्कूल के बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। पर सवाल इसके व्यावहारिक पक्ष पर खड़ा हो रहा है।

जिले की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि अधिकांश छात्रावास ब्लॉक मुख्यालय गौरेला, पेण्ड्रा और मरवाही में स्थित हैं, जबकि इनमें अधीक्षक के रूप में पदस्थ शिक्षकों का मूल विद्यालय 10 से 15 किलोमीटर दूर किसी सुदूर वनांचल ग्राम में है। ऐसी स्थिति में एक ही शिक्षक के लिए सुबह 6 बजे छात्रावास में बच्चों को जगाने, नाश्ता, भोजन व्यवस्था देखने और ठीक 10 बजे 15 किमी दूर अपने स्कूल में कालखंड लेना समय और दूरी के हिसाब से लगभग असंभव है।

छात्रावास अधीक्षक की ड्यूटी 24 घंटे की मानी जाती है। रात में यदि कोई बच्चा बीमार हो जाए या कोई अप्रिय घटना हो जाए तो पूरी जवाबदारी अधीक्षक की ही होती है। ऐसे में दिन में स्कूल और रात में छात्रावास, दोनों जगह न्याय कर पाना शिक्षकों के लिए चुनौती बन गया है।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षा विभाग के शिक्षकों को आदिवासी विकास विभाग के छात्रावासों में अधीक्षक बनाना ही एक अस्थायी जुगाड़ व्यवस्था है। न तो उन्हें अधीक्षक पद का पूर्णकालिक वेतनमान मिलता है और न ही उनके मूल स्कूल में उनकी अनुपस्थिति के लिए कोई वैकल्पिक शिक्षक की व्यवस्था की जाती है। इस आदेश के बाद अब शिक्षक दोहरी मानसिक दबाव में आ गए हैं।

*क्या हो सकता है बीच का रास्ता?*

स्थानीय शिक्षाविदों का मानना है कि यदि अध्यापन अनिवार्य ही करना है तो शिक्षक को उसके छात्रावास से 2-3 किलोमीटर के दायरे वाले विद्यालय में ही संबद्ध किया जाना चाहिए। दूसरा, शासन को छात्रावास अधीक्षक के लिए पृथक नियमित पद का सृजन करना चाहिए, ताकि शिक्षक सिर्फ शिक्षक ही रहे और अधीक्षक सिर्फ अधीक्षक। तीसरा विकल्प रोस्टर प्रणाली का भी हो सकता है।

फिलहाल कलेक्टर के इस सख्त आदेश के बाद सभी

विकासखंड शिक्षा अधिकारी और प्राचार्यों ने प्रमाण पत्र लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, वहीं शिक्षकों में इस बात को लेकर चिंता है कि 10-15 किमी दूर जाकर पढ़ाने की यह व्यवस्था कैसे संभव हो पाएगी , यहीआदेश अधीक्षकों के की वजह बना हुआ है।

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