
डेस्क खबर बिलासपुर../ बिलासपुर जिले के तखतपुर थाने में आखिर कानून का राज चल रहा है या समझौतों का? तीन दिन तक थाने परिसर में खड़े रहे ट्रक को बिना कार्रवाई छोड़ने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि अब खेत में लगे लोहे के एंगल और जाली चोरी के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि चोरी के संदेह में पकड़े गए दो नाबालिगों से पूछताछ की गई, चोरी का सामान बरामद होने का दावा भी सामने आया, लेकिन आखिरकार दोनों को बिना किसी स्पष्ट कानूनी कार्रवाई के छोड़ दिया गया। जानकारी के मुताबिक, गुरुवार को खेत में लगे लोहे के एंगल और जाली चोरी होने की शिकायत पर तखतपुर पुलिस ने कुछ नाबालिगों को पकड़ा था। थाने परिसर में पुलिसकर्मियों के स्तर पर चोरी का सामान बरामद होने की बात भी कही गई। बताया गया कि दो नाबालिगों को सुबह से शाम तक थाने में बैठाकर पूछताछ की गई। लेकिन इसके बाद मामले में कार्रवाई आगे बढ़ने के बजाय अचानक समझौते की चर्चा शुरू हो गई और दोनों किशोरों को छोड़ दिया गया।

शिकायतकर्ता नहीं चाहता था रिपोर्ट, इसलिए छोड़ दिया?
इस मामले में थाना प्रभारी का तर्क बताया जा रहा है कि शिकायतकर्ता रिपोर्ट दर्ज नहीं कराना चाहता था। ऐसे में सवाल यह है कि यदि चोरी की शिकायत पर पुलिस ने संदेहियों को पकड़ा, पूछताछ की और बरामदगी भी हुई, तो मामले का कानूनी निपटारा किस आधार पर किया गया? क्या शिकायतकर्ता की अनिच्छा ही पूरी कार्रवाई रोकने का आधार थी? क्या बरामदगी, जब्ती और अन्य जरूरी प्रक्रियाओं का रिकॉर्ड तैयार किया गया? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना बाकी है।

नाबालिगों से जुड़े मामलों में कानून के अनुसार प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि किशोरों को किस आधार पर छोड़ा गया और मामले में किशोर न्याय कानून के तहत आवश्यक प्रक्रिया अपनाई गई या नहीं।
ट्रक प्रकरण के बाद दूसरा मामला, पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल
तखतपुर थाने की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला यह दूसरा मामला है। इससे पहले दुर्घटना में एक युवक के गंभीर रूप से घायल होने और निजी अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद संबंधित ट्रक को तीन दिन तक थाने में खड़ा रखने तथा फिर बिना स्पष्ट कार्रवाई के छोड़ने को लेकर सवाल उठे थे। अब चोरी के मामले में भी पकड़े गए नाबालिगों को छोड़ने की चर्चा ने इन सवालों को और बढ़ा दिया है।
उच्च अधिकारियों को जानकारी दी गई या नहीं?
यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि चोरी के इस मामले में थाना प्रभारी ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पूरी जानकारी दी थी या नहीं। यदि दी गई थी, तो क्या अधिकारियों ने मामले की प्रक्रिया और रिकॉर्ड की समीक्षा की? और यदि जानकारी नहीं दी गई, तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी?
पुलिस का दायित्व शिकायतों की जांच करना और कानून के मुताबिक कार्रवाई करना है। शिकायतकर्ता की इच्छा महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन जहां कानून के तहत कार्रवाई आवश्यक हो, वहां केवल आपसी समझौते के आधार पर मामला समाप्त किया जा सकता है या नहीं, यह जांच का विषय है।
अब सवाल सीधे हैं—चोरी का सामान बरामद हुआ था तो उसका रिकॉर्ड कहां है? नाबालिगों को छोड़ने का आधार क्या था? और क्या पूरे मामले की वरिष्ठ अधिकारियों से निष्पक्ष जांच कराई जाएगी?
तखतपुर पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठ रहे इन सवालों का जवाब अब विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को देना चाहिए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मामले में कानून के अनुसार प्रक्रिया अपनाई गई या फिर नियमों की अनदेखी करते हुए कानून को दरकिनार कर दिया गया ! जबकि जिले के उच्च अधिकारी कई बार स्पष्ट निर्देश जारी कर चुके है कि वर्दी कानून का पालन करवाने के लिए पहनी जाती न कि समझौता करवाने के लिए .!!
