डेस्क खबरबिलासपुर

1877 फर्जी नामों का साया, फिर मिली राशन दुकान! बहाली पर उठे बड़े सवाल, नियमों से समझौता या सिस्टम की मेहरबानी? खाद्य विभाग सवालों के घेरे में ??



डेस्क खबर बिलासपुर../ बिलासपुर जिले में शासकीय उचित मूल्य दुकानों की बहाली को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। जय गणेश प्राथमिक उपभोक्ता भंडार और आजाद महिला स्व सहायता समूह को दोबारा संचालन की अनुमति मिलने के बाद प्रशासन और खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि जिन दुकानों पर पहले राशन वितरण में गंभीर अनियमितताओं और फर्जी राशन कार्डों के मामले सामने आए थे, उन्हें फिर से संचालन की अनुमति कैसे दे दी गई?


जानकारी के अनुसार वर्ष 2025 में दोनों दुकानों के खिलाफ अनियमितताओं के आरोपों के चलते कार्रवाई करते हुए उनका संचालन निरस्त किया गया था। बाद में एडीएम न्यायालय के आदेश के आधार पर बहाली की गई। लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या बहाली से पहले सभी विभागीय नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया?


मामले की जड़ दिसंबर 2022 की उस जांच से जुड़ी है, जिसमें 1,877 फर्जी नाम राशन कार्डों में जोड़े जाने का खुलासा हुआ था। आरोपों के आधार पर आजाद महिला स्व सहायता समूह से जुड़े संचालक के पुत्र सद्दाम खान और जय गणेश प्राथमिक उपभोक्ता भंडार से जुड़े फिरोज खान के खिलाफ कार्रवाई की बात सामने आई थी। अब इन्हीं लोगों से जुड़े संस्थानों को दोबारा संचालन की अनुमति मिलने से सवाल और गहरे हो गए हैं।
सबसे बड़ा सवाल आरआरसी (राजस्व वसूली प्रमाण पत्र) की कार्रवाई को लेकर उठ रहा है। विभागीय नियमों के अनुसार यदि शासकीय राशन की हेराफेरी या आर्थिक अनियमितता सामने आती है तो संबंधित राशि की वसूली की प्रक्रिया पूरी होना आवश्यक माना जाता है। ऐसे में यदि आरआरसी की कार्रवाई पूरी नहीं हुई थी, तो दुकानों की बहाली किस आधार पर की गई?


स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि बहाली के बाद दुकान संचालन की जिम्मेदारी फिर उन्हीं लोगों को सौंप दी गई, जिनके नाम पहले विवादों में आए थे। यदि ऐसा है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े होना स्वाभाविक है। हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि और विभाग का पक्ष अभी सामने आना बाकी है।
खाद्य विभाग की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि विभागीय स्तर पर कथित संरक्षण और नजदीकियों के चलते दोबारा दुकान संचालन की अनुमति दी गई। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और विभाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।


अब मांग उठ रही है कि एडीएम न्यायालय के आदेश, आरआरसी की स्थिति, विभागीय जांच रिपोर्ट और बहाली से जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि पूरी प्रक्रिया नियमानुसार हुई या नहीं। यदि जांच में किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है, तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार पक्षों पर कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। यह कोई पहला मामला नहीं है गौरतलब है कि फर्जी जीपीएस के जरूर आबंटन में बड़ी गड़बड़ी कर सरकारी चावल चुनिंदा गोदाम में खाली करवा कर और बोरिया बदल कर छोटी छोटी गाड़ियों के जरिए खपा कर मुनाफाखोरी और कालाबाजारी की जा रही है।आरोप है कि खाद्य अधिकारी इस मामले की जानकारी होने के बाद भी कार्यवाही से बचते है और मीडियाकर्मियों का फोन तक रिसीव नहीं करते है ।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या गरीबों के राशन से जुड़े इतने गंभीर आरोपों के बाद हुई इस बहाली की निष्पक्ष जांच होगी, या फिर पूरा मामला एक बार फिर फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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