डेस्क खबरबिलासपुर

न्यायधानी में कलेक्टर के निर्देश पर फाइल दौड़ी… सिस्टम जीत गया, तीन बच्चों का भविष्य हार गया!
“योजना नहीं है…” — सिर्फ 3 शब्दों ने 10वीं की छात्रा के डॉक्टर बनने के सपने पर लगा दिया विराम .??



डेस्क खबर बिलासपुर../ प्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में एक बार फिर सरकारी सिस्टम के आगे मानवता हार गई । गरीब मां बाप की फ़रियाद बिलासपुर कलेक्टर के निर्देश पर हर बार की तरह सरकारी सिस्टम में फाइलों में ही दौड़ती रह गई और बच्चों का भविष्य पर ग्रहण लग गया। सिस्टम को हिला देने इस मामले के सामने आने के बाद सवाल खड़े हो रहे है  क्या सरकारी व्यवस्था का काम सिर्फ फाइल आगे बढ़ाना है? क्या एक घायल पिता, कर्ज में डूबा परिवार और पढ़ाई छूटने की कगार पर खड़े तीन बच्चों के लिए सिस्टम के पास सिर्फ एक जवाब बचा है—”योजना नहीं है”?


सड़क हादसे में पिता किशन लाल देवांगन गंभीर रूप से घायल हुए। जबड़ा कई जगह से टूट गया, आंख पर टांके लगे, पैर की हड्डी बाहर निकल आई। इलाज के लिए परिवार पांच लाख रुपये के कर्ज में डूब गया। अब कमाने वाला बिस्तर पर है और तीन बच्चों का भविष्य सरकारी फाइलों में दम तोड़ रहा है।
मां चित्रलेखा देवांगन ने उम्मीद के साथ कलेक्टर से गुहार लगाई। कलेक्टर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी को कार्रवाई के निर्देश दिए। लेकिन जवाब आया—”आर्थिक सहायता की कोई योजना नहीं है, बच्चों को सरकारी स्कूल में भर्ती करा दीजिए।”
सवाल यह है कि क्या एक आदेश जारी कर देना ही प्रशासनिक संवेदनशीलता है?
क्या किसी 10वीं बोर्ड की छात्रा को बीच सत्र में स्कूल बदल देना ही समाधान है? उसकी जमा फीस कौन लौटाएगा? उसका बोर्ड का साल खराब होने की जिम्मेदारी कौन लेगा? उसके डॉक्टर बनने के सपने का हिसाब कौन देगा?
आज गीतिका की फीस बाकी है, नूपुर की किताबें अधूरी हैं और सबसे छोटा बेटा युवराज दवा के इंतजार में है। दूसरी ओर सरकारी फाइलों में लिखा जा चुका है—”प्रकरण का निराकरण।”
यही सबसे बड़ा दर्द है।
सिस्टम नियमों का हवाला देकर खुद को बेदाग साबित कर देता है, लेकिन गरीब परिवार नियम नहीं, इंसानियत की उम्मीद लेकर सरकारी दफ्तर पहुंचता है।
अगर किसी योजना में मदद का प्रावधान नहीं है, तो क्या जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि, समाज कल्याण विभाग, मुख्यमंत्री राहत कोष या अन्य मानवीय सहायता के विकल्प तलाशना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है?
आज सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो फाइलों में कार्रवाई पूरी मान लेती है, लेकिन बच्चों के हाथों में किताबें नहीं पहुंचा पाती। अगर आज गीतिका की पढ़ाई छूट गई, तो उसकी मार्कशीट पर सिर्फ एक साल बर्बाद नहीं होगा… उस पर सिस्टम की संवेदनहीनता की मुहर भी होगी। हालांकि यह जरूर है कि मीडिया की खबरों के बाद सरकार अधिकारी और कई समाजसेवी इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मदद के लिए आगे आयेगें पर सवाल तब भी बाकी रह जायेगा कि सिस्टम आखिर कब जागेगा .??


मां चित्रलेखा देवांगन ने उम्मीद के साथ कलेक्टर से गुहार लगाई। कलेक्टर ने संवेदनशीलता दिखाते हुए जिला शिक्षा अधिकारी को कार्रवाई के निर्देश दिए। लेकिन जवाब आया—”आर्थिक सहायता की कोई योजना नहीं है, बच्चों को सरकारी स्कूल में भर्ती करा दीजिए।”
सवाल यह है कि क्या एक आदेश जारी कर देना ही प्रशासनिक संवेदनशीलता है?
क्या किसी 10वीं बोर्ड की छात्रा को बीच सत्र में स्कूल बदल देना ही समाधान है? उसकी जमा फीस कौन लौटाएगा? उसका बोर्ड का साल खराब होने की जिम्मेदारी कौन लेगा? उसके डॉक्टर बनने के सपने का हिसाब कौन देगा?
आज गीतिका की फीस बाकी है, नूपुर की किताबें अधूरी हैं और सबसे छोटा बेटा युवराज दवा के इंतजार में है। दूसरी ओर सरकारी फाइलों में लिखा जा चुका है—”प्रकरण का निराकरण।”
यही सबसे बड़ा दर्द है।
सिस्टम नियमों का हवाला देकर खुद को बेदाग साबित कर देता है, लेकिन गरीब परिवार नियम नहीं, इंसानियत की उम्मीद लेकर सरकारी दफ्तर पहुंचता है।
अगर किसी योजना में मदद का प्रावधान नहीं है, तो क्या जिला प्रशासन, जनप्रतिनिधि, समाज कल्याण विभाग, मुख्यमंत्री राहत कोष या अन्य मानवीय सहायता के विकल्प तलाशना भी व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है?
आज सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है जो फाइलों में कार्रवाई पूरी मान लेती है, लेकिन बच्चों के हाथों में किताबें नहीं पहुंचा पाती। अगर आज गीतिका की पढ़ाई छूट गई, तो उसकी मार्कशीट पर सिर्फ एक साल बर्बाद नहीं होगा… उस पर सिस्टम की संवेदनहीनता की मुहर भी होगी। हालांकि यह जरूर है कि मीडिया की खबरों के बाद सरकार अधिकारी और कई समाजसेवी इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मदद के लिए आगे आयेगें पर सवाल तब भी बाकी रह जायेगा कि सिस्टम आखिर कब जागेगा .??

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