
डेस्क खबर बिलासपुर ../ गरीबों और जरूरतमंदों तक खाद्य सुरक्षा योजना का लाभ पहुंचाने के लिए सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन बिलासपुर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के चावल को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप हैं कि जिले में एक संगठित “चावल सिंडिकेट” सक्रिय है, जो गरीबों के हिस्से के चावल को बाजार तक पहुंचाने के खेल में लगा हुआ है।
जानकारी के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा उचित मूल्य दुकानों के माध्यम से हितग्राहियों को मुफ्त चावल और अन्य खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन आरोप यह हैं कि गोदाम से दुकान तक पहुंचने वाली व्यवस्था में ही बड़े स्तर पर गड़बड़ी हो रही है। सूत्र दावा करते है कि इस चावल की हेराफेरी में शहरी क्षेत्रों में स्थित दुकानों का आधा से ज्यादा चावल एक बड़े सरगना खपाने का कार्य किया जाता है और इसी सरगना से और कई दुकानदार सरकारी चावल लेकर राइस मिलो में खपा कर जमकर मुनाफ़खोरी कर चावल की कालाबाजारी कर रहे है ।
सूत्रों के मुताबिक, कई मामलों में गाड़ियों में लगे GPS ट्रैकर को केवल औपचारिकता बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। आरोप हैं कि दुकानों के सामने गाड़ी खड़ी कर GPS रिकॉर्ड तैयार किया जाता है, जबकि चावल को कहीं और उतार दिया जाता है। इस पूरे खेल में कुछ उचित मूल्य दुकान संचालकों, दलालों और व्यापारिक नेटवर्क के साथ विभाग के अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है।

हाल ही में शासन द्वारा “रजत जयंती चावल उत्सव” के तहत तीन माह का चावल एकमुश्त वितरित किया गया था। लेकिन आरोप हैं कि गरीबों तक पूरा राशन पहुंचने से पहले ही बड़े पैमाने पर अफरा-तफरी हुई। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज है कि चावल दुकानों से निकलकर खुले बाजार और अन्य नेटवर्क तक पहुंच रहा है।
शहर के तालापारा, मगरपारा, कुम्हारपारा, समता कॉलोनी, गोड़पारा, सरकंडा, खपरगंज, गांधी चौक और करबला सहित कई इलाकों का नाम इस कथित नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है।
रजत जयंती चावल उत्सव पर जमकर लुट खसोट मचाई गई लेकिन खाद्य विभाग हस्तिनापुर की सभा में धृतराष्ट्र की तरह बैठा रहा.. मीडिया ने महाभारत के संजय की तरह जिले में चल रहे लुट खसोट की जानकारी दी लेकिन धृतराष्ट्र कर भी क्या सकता था..

दुकानों से ऑटो गाड़ियों और जनरल स्टोर तक चावल की अफरा तफरी तक तो ठीक है लेकिन जिले में पूरे गाड़ी में भरे चावल की अफरा तफरी कर दी जा रही है इस पूरे खेल में जिले के कई शासकीय उचित मूल्य दुकान के संचालको (विक्रेताओ) की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है.. विश्वस्त सूत्रों की माने तो ये खेल चावल गोदाम से दुकान के लिए गाड़ी निकलने से पहले शुरू हो जाता है, जहां दुकानदार थोक के भाव में चावल का पैसा ले लेता है, लेकिन शासन को दिखाने और जीपीएस में सबूत बनाने के लिए दुकानों तक गाड़ियों को दौड़ाया जाता है
दुकानों से ऑटो गाड़ियों और जनरल स्टोर तक चावल की अफरा तफरी तक तो ठीक है लेकिन जिले में पूरे गाड़ी में भरे चावल की अफरा तफरी कर दी जा रही है इस पूरे खेल में जिले के कई शासकीय उचित मूल्य दुकान के संचालको (विक्रेताओ) की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है.. विश्वस्त सूत्रों की माने तो ये खेल चावल गोदाम से दुकान के लिए गाड़ी निकलने से पहले शुरू हो जाता है, जहां दुकानदार थोक के भाव में चावल का पैसा ले लेता है, लेकिन शासन को दिखाने और जीपीएस में सबूत बनाने के लिए दुकानों तक गाड़ियों को दौड़ाया जाता है इतना ही नहीं चावल की कुछ बोरियों को उतारा भी जाता है, शहर के तालापारा, मगरपारा, कुम्हारपारा, समता कॉलोनी, गोड़पारा, सरकंडा खपरगंज गांधी चौक, करबला समेत कई इलाकों में इस तरह का काम किया जा रहा है.. बिलासपुर में पीडीएस चावल के सिंडिकेट का सबसे बड़ा खिलाड़ी अपने खेल को शहर के अलग अलग इलाकों में डिवाइड कर खेल को खेलता है, जिसमें सरकंडा क्षेत्र में रिश्तेदार की दुकान, शहर के मध्य नगर में और बाजार इलाका शामिल है.. ये खिलाड़ी सीधा दुकानदारों से सेटिंग करता है और व्यापारी तक समान पलटी कर देता है, राइस मिल तक चावल पलटाने का जोखिम खुद पर नहीं लेता है । कुछ माह पहले इस तरह का मामला तालापारा के कुम्हारपारा क्षेत्र का था जहां दुकानदार द्वारा दुकान में रखा सारा चावल बेच दिया गया था, लेकिन जानकारी के बावजूद भी खाद्य विभाग के नियंत्रक अमृत कुजूर द्वारा दुकान के भौतिक सत्यापन के लिए निरीक्षक को दुकान में नहीं भेजा गया था, और दुकानदार को वापस बाजार से खरीदकर चावल दुकान में रखने का समय दे दिया गया था.. तीन माह के एकमुश्त चावल वितरण किया जा चुका है, जिसमें जमकर बंदरबांट हुआ लेकिन विभाग अभी भी आंखमूंद कर बैठा हुआ है..
सूत्रों का दावा है कि सिंडिकेट का एक बड़ा खिलाड़ी शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में अपना नेटवर्क बनाकर काम कर रहा है। आरोप यह भी हैं कि दुकानदारों से सीधे सेटिंग कर चावल को व्यापारियों तक पहुंचाया जाता है, जबकि आगे की सप्लाई दूसरे माध्यमों से की जाती है।
कुछ महीने पहले तालापारा-कुम्हारपारा क्षेत्र में भी इसी तरह का मामला सामने आया था, जहां आरोप लगा कि दुकान में रखा पूरा चावल बेच दिया गया था। हालांकि, विभागीय कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठे थे।
अब सवाल यह उठ रहा है कि गरीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं की निगरानी आखिर कितनी प्रभावी है? अगर GPS और रिकॉर्ड होने के बावजूद गड़बड़ी की आशंका बनी हुई है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? गौरतलब है कि गोदामों से सरकारी चावल ले कर निकली गाड़िया राशन दुकानों में खाली ना होकर कुछ चुनिंदा जगहों पर खाली कर दी जाती है और इसके बाद चावल की हेराफेरी कर हर महीने लाखों करोड़ों रु का व्यारा न्यारा कर दिया जाता है। बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल में बड़ा नाम जुड़ा हुआ है जिसकी राजनीति पृष्ठभूमि और सेटिंग तगड़ी है। दावा किया जाता है कि चावल के खेल के सरगना की जानकारी विभाग के अधिकारियों को भी है लेकिन कार्यवाही शून्य है।
आगामी अंकों में GPS का कैसे चलता है खेल ?? कौन है बड़ा खिलाड़ी ? फोटो और गाड़ियों के नंबर सहित बड़ा खुलासा जल्द ही .!
