
डेस्क खबर बिलासपुर ../ प्रदेश की न्यायधानी बिलासपुर के जिला अस्पताल में प्रशासनिक लापरवाही और नियमों की अनदेखी का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। सिविल सर्जन पद से सेवानिवृत्त हो चुके डॉ. अनिल गुप्ता को सिर्फ मौखिक आदेश के आधार पर फिर से उसी कुर्सी पर बैठाकर अस्पताल का संचालन कराया जा रहा है,जहां से वे रिटायर्ड हो चुके है ।बताया जा रहा है कि प्रभारी सिविल सर्जन डॉ. मनीष श्रीवास्तव के अवकाश पर होने के दौरान डॉ. गुप्ता न केवल ओपीडी में मरीजों का इलाज कर रहे हैं, बल्कि वार्ड का निरीक्षण कर भर्ती और डिस्चार्ज सहित प्रशासनिक फैसले जैसी जिम्मेदारियां भी निभा रहे हैं। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार डॉ. गुप्ता मेडिसिन विशेषज्ञ (एमडी) हैं और अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी को देखते हुए उन्हें बनाए रखने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, नियमों के तहत 65 वर्ष की आयु के बाद पुनर्नियुक्ति के लिए वित्त विभाग की स्वीकृति और स्वास्थ्य परीक्षण अनिवार्य होता है।

इसके बावजूद बिना औपचारिक आदेश के उन्हें जिम्मेदारी सौंपना गंभीर अनियमितता मानी जा रही है। अब यह देखना अहम होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले पर क्या कार्रवाई करते हैं और क्या अस्पताल की व्यवस्था नियमों के दायरे में वापस लाई जाती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक रिटायर अधिकारी को बिना किसी वैध लिखित आदेश और प्रक्रिया के इस तरह नियमों के मुताबिक, किसी भी सेवानिवृत्त डॉक्टर की पुनर्नियुक्ति के लिए वित्तीय स्वीकृति, विभागीय अनुमति और फिटनेस जांच जरूरी होती है। लेकिन यहां इन सभी प्रक्रियाओं को दरकिनार कर “जरूरत” के नाम पर काम चलाया जा रहा है। बताया जा रहा है कि DMF फंड से नियुक्ति की तैयारी है, लेकिन अब तक वित्त विभाग की मंजूरी नहीं मिली है। यह पूरा मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पर कार्रवाई करते हैं या फिर “मौखिक आदेश” के सहारे ही अस्पताल चलता रहेगा ? या फिर अस्पताल की व्यवस्था नियमों के दायरे में वापस लाई जाती है।
वही इस मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी डाक्टर शुभा गढ़ेवाल को कई बार फोन लगाया गया लेकिन उन्होंने अपने स्वभाव के अनुसार फोन रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा।

