
भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही है। दिल्ली से गुजरात तक फैली यह श्रृंखला केवल पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि उत्तर भारत की जलवायु, भूजल संतुलन और जैव विविधता की रीढ़ मानी जाती है। राजस्थान के 15 ज़िलों से होकर गुजरने वाली अरावली को “उत्तर भारत के फेफड़े” कहा जाता है, लेकिन अब यही फेफड़े दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।
बीते वर्षों में अवैध खनन और अतिक्रमण ने अरावली को अंदर से खोखला कर दिया है। सरिस्का टाइगर रिज़र्व जैसे संवेदनशील क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं रहे। हालात तब और गंभीर हो गए जब पर्यावरण मंत्रालय ने एक नया मसौदा पेश किया, जिसमें केवल 100 मीटर या उससे ऊँची पहाड़ियों को ही अरावली का संरक्षित हिस्सा मानने का प्रस्ताव है।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यह परिभाषा बेहद संकीर्ण है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान की अधिकांश पहाड़ियाँ 100 मीटर से कम ऊँचाई की हैं। यदि नया नियम लागू हुआ, तो करीब 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएँगी, जिससे खनन गतिविधियों को खुली छूट मिल सकती है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अरावली क्षेत्र में एक किलोमीटर के दायरे में खनन पर रोक लगा चुका है, फिर भी ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है। पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि यदि संरक्षण के मानक कमजोर किए गए, तो इसका असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं रहेगा—जल संकट, तापमान वृद्धि और जैव विविधता का विनाश तय है।
आज सवाल सिर्फ पहाड़ों का नहीं, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का है। अरावली को बचाना प्रकृति ही नहीं, मानव जीवन की सुरक्षा भी है।