

डेस्क खबर बिलासपुर ../ प्रदेश की न्यायधानी बिलासपुर में सरकारी राशन से लेकर गैस तक की जमकर कालाबाजारी हो रही है लेकिन उसके वावजूद जिम्मेदार खाद्य विभाग आँख मूंदे बैठा हुआ है, विभाग के अधिकारियों के पास शिकायतों का अंबार है मीडिया रिपोर्ट्स सहित तत्कालीन खाद्य नियंत्रक की जांच रिर्पोट पर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होने से खाद्य नियंत्रक सवालों के घेरे में है ?? सूत्रों और मीडिया में प्रसारित खबरों की माने तो तारबाहर क्षेत्र में संचालित विनोद गैस एजेंसी के तार चर्चित खनूजा परिवार से जुड़े हुए है। गैस दुकानों सहित सरकारी राशन दुकानें आपसी भाईचारा और अधिकारियों की साठगांठ के चलते बेखौफ होकर किरायेदारों द्वारा संचालित की जा रही है, हालांकि इन आरोपों की कोई लिखित पुष्टि नहीं है लेकिन कार्डधारियों को भी इस खेल की पूरी जानकारी है। गौरतलब है कि जिस तरह गैस एजेंसी में बिना डिलवरी के उपभोक्ता तक गैस पहुंचने का दावा किया है है ठीक उसी तरह शहर के नदी किनारे के एक गोदाम में सरकारी चावल की बड़ी खेप सीधे खपाया जा रहा है। नाम न छापने की शर्त में स्थानीय निवासी ने जानकारी में बताया कि सरकारी राशन लोड गाड़ियों से बिना किसी परमिशन के अवैध रूप से एक निश्चित स्थान पर सुबह से ही सरकारी चावल खाली करवाया जाता है और फिर इन्हीं चावल को दूसरी बोरियो में भरकर बड़ी बड़ी गाड़ियों से राइस मिलो में भेज कर बड़ी मुनाफाखोरी कमाई की जाती है। बताया जा रहा है कि शहर में सरकारी राशन दुकानों को आबंटित सार्वजनिक वितरण प्रणाली का चावल का 60 फीसदी से ज्यादा राशन फर्जी जीपीएस दिखाकर एक बड़े साहूकार के माध्यम से हितग्राहियों की बजाय अन्य लोगों के पास खपाया जा रहा है । सालों से सरकारी चावल की अफरा तफरी और हेराफेरी का खेल की जानकारी होने के बाद भी खाद्य विभाग अंजान बना हुआ बैठा है यह खेल सुबह से चलता रहता है और गाड़ियों में भरकर सरकारी राशन बिल्हा, तखतपुर,रतनपुर सहित आसपास मौजूद राइस मिलो के अलावा अन्य जिलों भी भेजा जा रहा है। सरकारी चावल से लदी गाड़ियों पर सूचना देने के बाद भी कार्यवाही नहीं होने से सवाल खड़े हो रहे है और चावल की कालाबाजारी से अवैध व्यापारी मालामाल हो रहे है। बताया जा रहा है कि एक सिंडिकेट पूरे गिरोह को संचालित कर रहा है सरकारी चावल की गाड़ियों के जीपीएस सिस्टम में गड़बड़ी कर विभाग को गुमराह किया जा रहा है ।

लगातार सरकारी चावल की हेराफेरी और हालही में तारबाहर थाने में दर्ज गैस वितरण से जुड़े मामले ने केवल एक गैस एजेंसी ही नहीं, बल्कि खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक उपभोक्ता के नाम पर बिना सिलेंडर दिए डिलीवरी दर्ज होने और भुगतान दिखाए जाने के मामले के सामने आने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि यदि लंबे समय से ऐसी गड़बड़ियां चल रही थीं तो निगरानी के लिए जिम्मेदार विभाग आखिर कर क्या रहा था?
शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार गैस सिलेंडर की आपूर्ति किए बिना रिकॉर्ड में डिलीवरी और भुगतान दर्ज कर दिया गया। इसके अलावा कई पुरानी सप्लाई एंट्रियों पर भी सवाल उठाए गए हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक एजेंसी की लापरवाही नहीं बल्कि निगरानी व्यवस्था की बड़ी विफलता मानी जाएगी।


स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि घरेलू गैस सिलेंडरों के कथित व्यावसायिक उपयोग और गैस,सरकारी चावल की हेराफेरी की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नियमित निरीक्षण और सत्यापन की जिम्मेदारी निभाने वाले खाद्य विभाग को इन गतिविधियों की भनक क्यों नहीं लगी?
लोग पूछ रहे हैं कि यदि उपभोक्ताओं के नाम पर कथित फर्जी आपूर्ति दर्ज की जा रही थी तो विभागीय जांच और मॉनिटरिंग सिस्टम ने इसे समय रहते पकड़ क्यों नहीं पाया। अब जब मामला पुलिस तक पहुंच गया है, तब विभाग जांच की बात कर रहा है।

हालांकि कुछ मीडिया संस्थानों में छपी खबर के अनुसार खाद्य नियंत्रक अमृत कुजूर ने मामले में विभागीय जांच शुरू होने और रिपोर्ट कलेक्टर को सौंपने की बात कही है। लेकिन शहर में चर्चा इस बात की है कि यदि समय पर निगरानी होती तो शायद मामला थाने तक नहीं पहुंचता। और चर्चा यह भी है कि क्या कुछ चावल चोरों के अध्यक्ष के खिलाफ की गई विभागीय जांच रिपोर्ट कलेक्टर साहब तक पहुंचाई गई है ??

फिलहाल जांच जारी है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने खाद्य विभाग की सक्रियता, निरीक्षण व्यवस्था और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि जांच में केवल एजेंसी पर कार्रवाई होगी या फिर निगरानी में हुई कथित लापरवाही की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी।
तमाम मामलों और आरोपों की पुष्टि के लिए जब खाद्य नियंत्रक अमृत कुजूर को फोन लगाया गया तो हर बार की तरह इस बार भी उन्होंने मोबाइल रिसीव करना मुनासिब नहीं समझा। मीडिया साथियों से मिली जानकारी के अनुसार जिम्मेदार अधिकारी न तो आरोपों पर कैमरे के सामने कुछ बोलते है और ना ही नार्मल काल में बात करते है और जनता से जुड़े मुड़े के सवालों पर जवाब देने से बचते नजर आते है। यहां तक कि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी भी गोल मोल तरीके से नियमों का हवाला देकर स्पष्ट देने से बचते नजर आते है।