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नई दिल्ली। किसी देश की विकास यात्रा को केवल बजट, सरकारी योजनाओं और आर्थिक आंकड़ों से नहीं समझा जा सकता। सत्ता में बैठे नेतृत्व की प्राथमिकताएं भी यह बताती हैं कि देश किन चुनौतियों से निकलकर किस दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए भाषणों को पिछले एक दशक के संदर्भ में देखें तो भारत की विकास यात्रा में आए बदलाव की तस्वीर साफ नजर आती है।2014 के आसपास लाल किले से प्रधानमंत्री के संबोधनों में देश की बुनियादी जरूरतें प्रमुखता से सामने आती थीं। शौचालय, बिजली, सड़क, बैंक खाते, गरीबी और किसानों की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दे केंद्र में थे। समय के साथ इन प्राथमिकताओं का दायरा बढ़ा और चर्चा केवल बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रही। भारत को तकनीक, उद्योग और रणनीतिक क्षमताओं के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने पर जोर बढ़ता गया।
एक दशक में बदली प्राथमिकताओं की तस्वीर
शुरुआती वर्षों में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन बुनियादी सुविधाओं को आम लोगों तक पहुंचाने की थी, जो सीधे जीवन स्तर से जुड़ी थीं। बिजली कनेक्शन, शौचालय, बैंकिंग व्यवस्था, सड़क और गरीबों के लिए योजनाएं इसी दौर की प्रमुख प्राथमिकताएं रहीं।इसके बाद विकास का फोकस धीरे-धीरे व्यापक क्षमता निर्माण की ओर बढ़ा। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, आधुनिक तकनीक और परमाणु ऊर्जा जैसे विषय राष्ट्रीय विकास की चर्चा का हिस्सा बने। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत की जरूरतें अब केवल आधारभूत सुविधाओं के विस्तार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने वाली क्षमताएं विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
नक्सल प्रभावित इलाकों में बदली तस्वीर का भी जिक्र
प्रधानमंत्री के संबोधनों में वामपंथी उग्रवाद और उससे प्रभावित युवाओं की चिंता भी प्रमुख विषय रही है। 2017 में माओवादी हिंसा को समाप्त करने और युवाओं को उग्रवाद की राह पर जाने से रोकने पर विशेष जोर दिया गया था।विकास योजनाओं और प्रभावित क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयासों के बीच वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या में भी कमी का उल्लेख किया गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जहां कभी यह समस्या 126 जिलों तक फैली थी, वहीं 2018 में यह संख्या 90 जिलों और 2025 तक 20 जिलों तक पहुंचने की बात सामने आई।2026 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में प्रधानमंत्री ने इस बदलाव को विकास और भरोसे से जोड़ते हुए बताया कि जिन इलाकों में कभी माओवादी हिंसा का प्रभाव था, वहां अब विकास कार्यों और राष्ट्रीय ध्वज की मौजूदगी दिखाई दे रही है।
छत्तीसगढ़ में भी विकास की प्राथमिकताएं नए दौर में प्रवेश कर रही हैं
इसी व्यापक बदलाव की तस्वीर छत्तीसगढ़ सरकार के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में भी देखने को मिली। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राजधानी रायपुर में ध्वजारोहण के बाद राज्य की उपलब्धियों और आने वाली योजनाओं का उल्लेख किया। उनके संबोधन में माओवादी हिंसा के खात्मे के साथ आधुनिक तकनीक और एआइ को भी विकास के नए आधार के रूप में सामने रखा गया।मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में माओवादी हिंसा मुक्त भारत के संकल्प को पूरा होने की बात कही। साथ ही राज्य में 500 करोड़ रुपये के छत्तीसगढ़ राज्य एआइ मिशन को मंजूरी दिए जाने की जानकारी दी।
बदलते भारत की कहानी में अब क्षमता निर्माण सबसे आगे
पिछले वर्षों के स्वतंत्रता दिवस संबोधनों को एक साथ देखने पर विकास की प्राथमिकताओं में आया बदलाव स्पष्ट दिखाई देता है। शुरुआती दौर में लक्ष्य था कि लोगों को बुनियादी सुविधाएं मिलें और जीवन की आवश्यक जरूरतें पूरी हों। अब इसके साथ यह लक्ष्य भी जुड़ गया है कि भारत अत्याधुनिक तकनीक, उद्योग, ऊर्जा और रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी मजबूत क्षमता विकसित करे।यानी विकास की कहानी अब केवल शौचालय, बिजली और सड़क तक नहीं रुकती। सेमीकंडक्टर, एआइ और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्र इस बात के संकेत हैं कि भारत अपनी अगली विकास यात्रा के लिए कहीं बड़े लक्ष्य निर्धारित कर रहा है।














