


डेस्क खबर बिलासपुर ../ किसी भी माँ के लिए इससे बड़ा दुःख क्या होगा कि उसके बच्चे पढ़ना चाहते हों, लेकिन उसकी जेब खाली हो। तखतपुर विधानसभा के ग्राम गनियारी की चित्रलेखा देवांगन आज किसी सरकारी योजना की नहीं, बल्कि इंसानियत की उम्मीद लगाए बैठी हैं। कभी हँसता-खेलता यह परिवार आज दर्द, कर्ज और बेबसी के ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ हर सुबह एक नई चिंता लेकर आती है।
करीब चार महीने पहले सड़क हादसे ने इस परिवार की पूरी दुनिया बदल दी। परिवार के एकमात्र कमाने वाले किशन लाल देवांगन गंभीर दुर्घटना का शिकार हो गए। जबड़ा टूट गया, पैर की हड्डी बाहर निकल आई, शरीर में कई फ्रैक्चर हुए। उन्हें बचाने के लिए पत्नी ने अपने गहने गिरवी रख दिए, रिश्तेदारों से उधार लिया और करीब पाँच लाख रुपये का कर्ज सिर पर चढ़ गया।

पति तो बच गए… लेकिन परिवार की आर्थिक साँसें टूट गईं।
आज किशन लाल बिस्तर पर हैं। डॉक्टरों ने नियमित फिजियोथेरेपी की सलाह दी है, लेकिन घर में हालत यह है कि कभी दवा खरीदनी है तो कभी बच्चों की फीस भरनी है। हर दिन एक नई मजबूरी सामने खड़ी हो जाती है।



सबसे बड़ी बेटी गीतिका डॉक्टर बनने का सपना देखती है। वह 10वीं बोर्ड की छात्रा है। लेकिन आज उसके हाथों में किताबों से ज्यादा फीस की चिंता है। छोटी बहन नूपुर की पढ़ाई भी संकट में है और सबसे छोटा बेटा युवराज अभी इतना छोटा है कि उसे समझ भी नहीं आता कि उसकी माँ रात-रात भर क्यों रोती है।
माँ ने हार नहीं मानी। वह प्रशासन के पास पहुँची, कलेक्टर से गुहार लगाई। निर्देश भी हुए… फाइलें भी चलीं… लेकिन आखिर में जवाब मिला—”ऐसी कोई योजना नहीं है।”
एक सरकारी फाइल बंद हो गई… लेकिन एक माँ की परेशानी नहीं।
आज चित्रलेखा किसी अधिकारी से नहीं, समाज से हाथ जोड़कर कह रही हैं—
“मेरे बच्चों की पढ़ाई बचा लीजिए… मेरे पति को फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद कर दीजिए… मैं जिंदगी भर आपका एहसान मानूँगी।”
इस परिवार को आज सबसे ज्यादा जरूरत है—
पति की फिजियोथेरेपी के लिए लगभग ₹1 लाख के सहयोग की।
तीनों बच्चों की स्कूल फीस की।
कुछ महीनों तक परिवार के जीवन-यापन में सहयोग की।
यह खबर सिर्फ पढ़कर आगे बढ़ जाने की नहीं है।
हो सकता है, आपकी एक छोटी-सी मदद गीतिका को डॉक्टर बनने की राह पर बनाए रखे।
हो सकता है, आपका सहयोग एक पिता को फिर से अपने पैरों पर खड़ा कर दे।
हो सकता है, आपकी संवेदनशीलता एक माँ की आँखों के आँसू पोंछ दे।
समाज की ताकत हमेशा संकट में खड़े लोगों का सहारा बनी है। यदि सक्षम लोग, सामाजिक संगठन, उद्योगपति, जनप्रतिनिधि और सेवा कार्य से जुड़े नागरिक आगे आएँ, तो इस परिवार की जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सकती है।
किसी की जिंदगी बदलने के लिए हमेशा करोड़ों रुपये नहीं चाहिए होते… कभी-कभी सैकड़ों छोटे-छोटे सहयोग मिलकर भी एक परिवार की टूटी हुई उम्मीदों को फिर से जगा देते हैं।
आइए… एक माँ को यह एहसास दिलाएँ कि वह अकेली नहीं है।
आइए… तीन मासूम बच्चों के सपनों को फीस के अभाव में मरने न दें।
आइए… इंसानियत का हाथ बढ़ाएँ, क्योंकि शायद आज आपकी मदद किसी परिवार के लिए भगवान का भेजा हुआ सहारा बन जाए। एक मां ने बर्बादी की कगार पर खड़े अपने मासूम बच्चों के भविष्य और अपने पति की ज़िंदगी के लिए सरकार,अफसरों से लेकर समाजसेवकों से मार्मिक अपील कर इस दुख की घड़ी में सहयोग मांगा है अब देखना होगा कि इस दुख की घड़ी में कौन लोग मदद का हाथ बढ़ाते है ताकि एक परिवार की खुशियां वापिस आ सके और एक संदेश समाज तक पहुंच सके ।