फर्जी हार्ट डॉक्टर की करतूतों से जुड़ा बिलासपुर कनेक्शन, फर्जी सर्जन ने कर दिया था कर दिया बिना डिग्री के र्विधानसभा अध्यक्ष के हार्ट का आपरेशन , हो गई थी राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की मौत..! अपोलो अस्पताल चेन्नई मुख्यालय को ही डाक्टर की नियुक्ति का अधिकार..!


डेस्क खबर बिलासपुर…/ मध्यप्रदेश के दमोह जिले में फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट नरेंद्र विक्रमादित्य यादव द्वारा की गई सर्जरी के बाद मरीजों की मौत के मामलों ने अब बिलासपुर में भी हलचल मचा दी है। हाल ही में सामने आए इस मामले ने छत्तीसगढ़ के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष स्व. राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की 2006 में हुई मौत को लेकर कई पुराने सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है। आरोप है कि उनका ऑपरेशन भी इसी फर्जी डॉक्टर ने किया था, जिसने खुद को कार्डियोलॉजिस्ट बताकर अपोलो अस्पताल में नौकरी हासिल की थी। जबकि उसे सर्जरी आपरेशन करने की अनुमति नही थी। 2006 मे बिलासपुर के अपोलो अस्पताल मे चेन्नई मुख्यालय के आदेश के बाद पोस्टिंग की गई थी, ऐसे मे सवाल उठना लाजमी है कि बिना उनके मेडिकल सर्टिफिकेट की पुख्ता जांच किये बिना किस आधार चेन्नई मुख्यालय ने उसकी नियुक्ति बिलासपुर अपोलो अस्पताल मे की थी और सबसे बड़ा सवाल की और किस आधार पर उसे सर्जरी की भी अनुमति दी गई थी। आरोप है की अपोलो मे इस डाक्टर ने बिना डिग्री के करीब आधा दर्जन दिल की बीमारी से गर्सित लोगो के हार्ड का आपरेशन किया और सबकी मौत हो गई।

स्व. शुक्ल के पुत्र प्रदीप शुक्ल ने आरोप लगाया है कि उनके पिता की सर्जरी फर्जी डॉक्टर नरेंद्र विक्रमादित्य यादव ने की थी, जिसके बाद उनकी हालत बिगड़ती गई और 18 दिन बाद उनका निधन हो गया। अब जब दमोह में इस डॉक्टर की सच्चाई सामने आई है, तो उन्होंने अपोलो प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। प्रदीप शुक्ल ने कहा कि यदि उस समय सही जांच होती और दोषी पर कार्रवाई की जाती, तो शायद कई और जानें बचाई जा सकती थीं। वही इस मामले मे अपने पिता की मौत का सच लाने के लिए बिलासपुर कलेक्टर और वरिष्ठ पुलिस अधिक्षक से न्याय की गुहार भी लगाई है।

मामले के तूल पकड़ते ही अपोलो अस्पताल प्रबंधन भी सक्रिय हो गया है। जनसंपर्क अधिकारी देवेश गोपाल पुरानी फाइलों की जांच कर सच्चाई सामने लाने की बात कह रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रबंधन अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि डॉक्टर यादव ने अस्पताल में कितने ऑपरेशन किए थे और उन मरीजों की वर्तमान स्थिति क्या है।
अब सवाल यह है कि 2006 में जब डॉक्टर की नियुक्ति हुई, तो क्या उसकी जांच सही तरीके से की गई थी? क्या प्रबंधन को उसकी फर्जी डिग्रियों की भनक पहले ही लग गई थी, जिसके चलते कुछ ही महीनों में उसे हटा दिया गया? यदि ऐसा था, तो कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है, क्योंकि यह मामला सिर्फ एक अस्पताल या डॉक्टर का नहीं, बल्कि चिकित्सा व्यवस्था की साख और लोगों की जान से जुड़ा है।
