

डेस्क खबर बिलासपुर नरगोड़ा / मस्तूरी …15 सितंबर 2006 को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में कर्तव्य की वेदी पर सर्वोच्च बलिदान देने वाले 225 मीडियम रेजिमेंट (62 आरआर) के लांस नायक वीरेंद्र कुमार कैवर्त की शहादत को दो दशक से अधिक का समय बीत चुका है। इतने वर्षों में गृह ग्राम नरगोड़ा के मंचों से देशभक्ति के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी बलिदानी का वास्तविक समाधि स्थल उपेक्षा का शिकार है और उनके नाम पर जारी सरकारी बजट नियमों की अनदेखी की भेंट चढ़ गया है।
विधिक वारिस वीरांगना की उपेक्षा
सैन्य और प्रशासनिक दस्तावेजों के अनुसार बलिदानी वीरेंद्र कैवर्त की एकमात्र अधिकृत विधिक वारिस (Next of Kin) उनकी धर्मपत्नी डॉ. श्रीमती ज्योती कैवर्त हैं। पति के बलिदान के बाद उन्होंने आत्मनिर्भरता की राह चुनी, कठिन परिश्रम से चिकित्सा शिक्षा पूरी की और वर्तमान में बस्तर के वनांचल में शासकीय चिकित्सक के रूप में सेवारत हैं। इसके बावजूद नरगोड़ा में आयोजित होने वाले आधिकारिक कार्यक्रमों और स्मारक निर्माण की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में उन्हें पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया, जो सीधे तौर पर एक वीरांगना के विधिक और नैतिक अधिकारों की अवहेलना है।

DMF फंड का विचलन और हितों का टकराव
दस्तावेजों के अनुसार जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) द्वारा आदेश क्रमांक 260192601464 के तहत ₹10,30,000 की प्रशासकीय स्वीकृति दी गई थी, जिसकी प्रथम किस्त के रूप में ₹4,12,000 जारी भी किए जा चुके हैं।
* मूल उद्देश्य से भटकाव: राजभवन और सैनिक कल्याण संचालनालय के निर्देशों के तहत यह राशि बलिदानी की आदमकद प्रतिमा और गरिमामय स्मारक निर्माण के लिए स्वीकृत थी। इसके विपरीत पंचायत स्तर पर इसे गली-नाली और सामुदायिक निर्माण कार्य में तब्दील कर दिया गया।

* हितों का सीधा टकराव: लोक निर्माण विभाग (PWD) और पंचायती राज अधिनियम की निष्पक्ष निविदा व्यवस्था को दरकिनार करते हुए निर्माण का दायित्व बलिदानी के सगे छोटे भाई को सौंप दिया गया। यह प्रशासनिक मर्यादा और वित्तीय नियमों का खुला उल्लंघन है।
खेल मैदान के चयन से कानूनी अड़चन
मुख्य सार्वजनिक मार्ग पर स्मारक के लिए भूमि की व्यवस्था करने के बजाय प्राथमिक शाला के खेल मैदान में प्रतिमा स्थापना का प्रस्ताव लाया गया है।
* स्कूल का मैदान पहले से सीमित है, जहाँ निर्माण होने से बच्चों के खेलकूद की जगह छिन जाएगी।
* स्कूल शिक्षा विभाग की स्पष्ट गाइडलाइन के अनुसार शाला परिसर में किसी भी गैर-शैक्षणिक निर्माण के लिए शासन स्तर (सचिव) से एनओसी अनिवार्य होती है। इस प्रक्रियागत जटिलता के कारण स्मारक का काम अनिश्चितकाल के लिए लटकने की आशंका है।
समाधि स्थल की बदहाली
गांव से लगभग 3 किलोमीटर दूर स्थित वास्तविक समाधि स्थल झाड़ियों से घिरा पड़ा है। शहादत दिवस के आयोजनों में उस मूल स्थल की सुध लेने के बजाय गांव के चौक पर टेंट और लाउडस्पीकर लगाकर रस्म अदायगी पूरी कर ली जाती है।
पड़ोसी जिले महासमुंद में प्रशासन और समाज ने मिलकर भव्य शहीद पार्क की स्थापना कर मिसाल पेश की है, वहीं नरगोड़ा में प्रशासनिक शिथिलता और नियमों के विचलन के कारण बलिदानी का उचित सम्मान अब तक लंबित है।
इस पूरे मामले में वित्तीय स्वीकृति के अनुसार कार्य की तकनीकी जांच, निर्माण दायित्व के आवंटन की विधिक समीक्षा और वीरांगना डॉ. ज्योती कैवर्त की सहमति से मुख्य मार्ग पर शीघ्र गरिमामय स्मारक निर्माण ही न्यायोचित कदम होगा।
