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इंदौर बना मिसाल: क्या छत्तीसगढ़ में भी रुकेगा शिक्षा का ‘व्यापार’? किस कलेक्टर से होगी शुरुआत..



रायपुर/बिलासपुर/डेस्क– मध्यप्रदेश के इंदौर जिले के महू में एक छात्र की शिकायत पर हुई सख्त कार्रवाई ने पूरे देश में एक मजबूत संदेश दिया है। यहां कलेक्टर शिवम वर्मा ने निजी स्कूल और स्टेशनरी दुकानदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराकर यह साबित कर दिया कि यदि प्रशासन ठान ले, तो शिक्षा के नाम पर हो रही मनमानी पर लगाम लगाई जा सकती है।

अब सवाल उठ रहा है कि क्या छत्तीसगढ़ में भी कोई ऐसा कदम उठेगा? क्या यहां का प्रशासन भी शिक्षा के बढ़ते ‘व्यापारिकरण’ के खिलाफ इसी तरह की सख्ती दिखाएगा?


छत्तीसगढ़ में हावी ‘एजुकेशन माफिया’

छत्तीसगढ़ में निजी स्कूलों की मनमानी किसी से छिपी नहीं है। अच्छी शिक्षा के नाम पर अभिभावकों से भारी-भरकम फीस वसूली जाती है। इसके साथ ही एक तय दुकान से ही किताब-कॉपी खरीदने का दबाव बनाया जाता है स्कूल यूनिफॉर्म के नाम पर महंगे दाम भी वसूले जाते है इतना ही नहीं एडमिशन, डेवलपमेंट और अन्य शुल्कों के नाम पर अतिरिक्त वसूली जमकर की जाती है.. इन सबके जरिए पालकों को आर्थिक रूप से परेशान किया जा रहा है। कई मामलों में अभिभावक मजबूरी में चुप रहते हैं, क्योंकि उन्हें बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का डर रहता है।



इंदौर की कार्रवाई क्यों बनी मिसाल

महू के एक छात्र ने हिम्मत दिखाते हुए कलेक्टर से शिकायत की कि स्कूल द्वारा एक ही दुकान से किताब-कॉपी खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, इस पर कलेक्टर शिवम वर्मा ने बिना देरी किए, स्कूल संचालक के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए और संबंधित दुकानदार पर भी एफआईआर दर्ज करवाई.. उन्होंने साफ संदेश दिया कि शिक्षा को व्यापार नहीं बनने दिया जाएगा.. यह कदम न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन गया है..


छत्तीसगढ़ में कौन उठाएगा ऐसा कदम?

छत्तीसगढ़ में भी कई बार ऐसी शिकायतें सामने आती हैं, लेकिन उन पर ठोस कार्रवाई कम ही देखने को मिलती है, अब जरूरत है कि जिला प्रशासन सक्रिय होकर शिकायतों पर तुरंत संज्ञान ले.. शिक्षा विभाग सख्त नियमों का पालन सुनिश्चित करे, दोषी स्कूलों और व्यापारियों पर सीधी एफआईआर दर्ज हो, सबसे बड़ा सवाल यही है कि छत्तीसगढ़ में कौन सा कलेक्टर या जिला प्रशासन सबसे पहले आगे बढ़कर इस दिशा में ठोस पहल करेगा?

अभिभावकों को भी दिखानी होगी हिम्मत

इंदौर की तरह ही छत्तीसगढ़ में भी बदलाव तभी संभव है, जब अभिभावक खुलकर शिकायत करें और प्रशासन उन शिकायतों पर गंभीरता दिखाए.. यदि एक छात्र की आवाज पूरे सिस्टम को हिला सकती है, तो छत्तीसगढ़ में भी ऐसी पहल शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी बना सकती है.. इंदौर की कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि इच्छाशक्ति हो तो शिक्षा के नाम पर हो रही लूट को रोका जा सकता है। अब निगाहें छत्तीसगढ़ पर हैं, क्या यहां भी कोई प्रशासनिक अधिकारी आगे आकर इस ‘एजुकेशन माफिया’ के खिलाफ मिसाल कायम करेगा?

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