

डेस्क खबर बिलासपुर। जिले में सरकारी पीडीएस चावल की कथित कालाबाजारी ने प्रशासन और खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा गरीबों को मुफ्त या कम कीमत पर वितरित किए जाने वाले चावल की जमकर अवैध बिक्री हो रही है। शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में चावल की लदी गाड़ियां बेखौफ होकर राइस मिलों तक पहुंच रही हैं। मस्तूरी और रतनपुर, बिल्हा, तखतपुर, सिरगिट्टी समेत कई राइस मिलों में सरकारी चावल का खपाना कैमरे में कैद भी हुआ है। ताजा वीडियो रतनपुर के मोहतराई स्थित श्याम जी राइस मिल का है जहां बिलासपुर की सरकारी दुकान से निकला सरकारी चावल से भरा ऑटो राइस मिल में जाता हुआ कैमरे में कैद हुआ है ।
सूत्रों के अनुसार, कई राशन दुकानदार कस्टम मिलिंग के बहाने चावल को एकत्र कर राइस मिलों में भेजते हैं। इस खेल में दलाल सक्रिय हैं और राइस मिल संचालकों के साथ मजबूत सेटिंग है। सरकारी चावल अब 20 रुपये की जगह 23–24 रुपये में बिक रहा है। आरोप है कि खाद्य विभाग अधिकारी सब कुछ जानते हुए भी अधिकारी कार्यवाही से बचते हैं और कुछ मामलों में वसूली भी ली जाती है। वही इस पूरे मामले में राइस मिल के अंदर स्थित कर्मचारी ने बातचीत में बताया कि पूरा मामला सेटिंग से चलता है और इसके लिए ऊपर से नीचे तक मॉल पहुंचाया जाता है । हालांकि श्याम जी राइस मिल के अंदर मौजूद इस शख़्स ने कैमरे के सामने साफ साफ बोलने से इंकार कर दिया । पर शख्स की बातचीत और सच स्पष्ट करने के लिए तस्वीरें ही काफी है ।

गौरतलब है कलेक्टोरेट परिसर स्थित खाद्य विभाग लगातार सुर्खियों में बना रहता है और नियम कायदा का हवाला देकर अपनी जवाबदेही से बचता रहा है । विभागीय चर्चा है कि लंबे समय से विभाग में जमे अधिकारी बिना शोर-शराबे भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं ,गौरतलब है कि विक्रेता संघ अध्यक्ष ऋषि उपाध्याय अपने बेटे सहित सरकारी चावल के बदले नगद पैसा देते हुए कैमरे में कैद हो चुका है। डंकाराम वेब पोर्टल में पुख्ता प्रमाण खबर प्रसारित होने के बाद तत्कालीन खाद्य नियंत्रक अनुराग भदौरिया ने भी अपनी जांच रिपोर्ट के बाद ऋषि उपाध्याय ,अध्यक्ष सत्यशीला उपाध्याय और सचिव पुष्पा दीक्षित के खिलाफ मामला दर्ज करने की अनुशंसा भी की थी लेकिन नियम कायदों को ढाल बनाकर अभी तक वर्तमान खाद्य विभाग उस जांच रिपोर्ट देने में नियमों का हिलहवाला देकर बचता नजर आ रहा है ।


आरोप है कि विभागीय और राजनीतिक और रिश्तेदारी संरक्षण प्राप्त नेटवर्क की वजह से अवैध खरीद-फरोख्त चल रही है। ऐसे में गरीबों के लिए निर्धारित चावल तक पहुंच सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए चुनौती बनता जा रहा है। इस पूरे मामले ने न केवल गरीबों की भूख और हक मारा जा रहा है , बल्कि जिले में सरकारी राशन वितरण प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे है ।
